प्रयागराज में अदृश्य सरस्वती को मिला वैज्ञानिक आधार, गंगा और यमुना के बीच नीचे एक विशाल प्राचीन नदी दबी होने की हुई खोज

हैदराबाद. संगम नगरी प्रयागराज से जुड़ी एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आ रही है. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थित त्रिवेणी संगम को सदियों से ही गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन स्थल माना जाता रहा है. अब तक सरस्वती का अस्तित्व सिर्फ पौराणिक कथाओं में ही मिलता था, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा खोज निकाला है जिसने विज्ञान और आस्था के बीच की दूरी को कम कर दिया है.

सदियों से हम जिसे आस्था की आंखों से देखते आए थे, अब विज्ञान ने उसकी पुष्टि कर दी है। प्रयागराज के संगम को हमेशा से गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन का स्थान माना गया है। एक त्रिवेणी, जिसमें दो नदियां दिखती थीं, और तीसरी सिर्फ श्रद्धा में बहती थी। अब हैदराबाद के सीएसआईआर-नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट (एनजीआरआई) के वैज्ञानिकों ने इस पौराणिक मान्यता को एक ठोस वैज्ञानिक आधार दे दिया है। हेलीकॉप्टर से किए गए एयरबोर्न सर्वे और जमीन पर की गई कन्फर्मेटरी ड्रिलिंग के बाद डॉ. सुभाष चंद्र की टीम ने पुष्टि की है कि गंगा और यमुना के बीच जमीन से 10 से 15 मीटर नीचे एक विशाल प्राचीन नदी दबी हुई है। इसकी चौड़ाई, गहराई और आधार स्तर, तीनों गंगा और यमुना के बराबर हैं। यानी यह कोई छोटी सहायक धारा नहीं थी। यह स्वयं एक मुख्य नदी थी। विज्ञान इसे ‘पेलियो रिवर’ कहता है। ये वे पुरानी नदियां हैं जो कभी सतह पर बहती थीं, लेकिन अब मिट्टी की परतों के नीचे दबी हुई हैं।

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम को लेकर सदियों से चली आ रही एक पौराणिक कथा पर अब विज्ञान की मुहर लगती दिख रही है. गंगा और यमुना का मिलन तो पूरी दुनिया अपनी आंखों से देखती है, लेकिन अदृश्य सरस्वती हमेशा से आस्था और रहस्यों के घेरे में रही है. अब देश के प्रमुख वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से जुड़ा बड़ा दावा किया है.

वैज्ञानिकों ने इस दबी हुई नदी को अभी संगम से करीब 25 किलोमीटर पहले तक स्पष्ट रूप से ट्रैक किया है. शहर के अन्दर घनी आबादी और बिजली की लाइनों के कारण सेंसर काम नहीं कर पाए, इसलिए संगम के ठीक नीचे इसकी मौजूदगी की पुष्टि करना थोड़ा मुश्किल है. हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके लक्षण संगम की ओर ही जाते हैं.

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