जशपुर के प्रसिद्ध सोगड़ा आश्रम परिसर में खिला है दुर्लभ पीला पलाश, उमड़ रही भारी भीड़..!

जशपुरनगर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले स्थित प्रसिद्ध सोगड़ा आश्रम परिसर में हजारों लाल पलाश के पेड़ों के बीच एक दुर्लभ, पीला पलाश खिलने से यहां श्रद्धालुओं, प्रकृति प्रेमियों और वनस्पति विशेषज्ञों की भीड़ उमड़ रही है।
सामान्य रूप से फल्गुन माह में जंगल लाल-नारंगी पलाश के फूलों से ढक जाते हैं, जिन्हें, जंगल की आग भी कहा जाता है। मगर इससे अलग सोगड़ा आश्रम में लाल की जगह एक पेड़ में पलाश का पीला फूल खिला है। यह दुर्लभ फूल लोगों में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
जानकारों के अनुसार वनस्पति विज्ञान में इसे बेहद दुर्लभ माना जाता है। हजारों पेड़ों में कहीं एक ऐसा पेड़ प्राकृतिक रूप से विकसित होता है। सोगड़ा आश्रम प्रबंधन के अनुसार, यह स्थान पहले से ही आध्यात्मिक शांति और दुर्लभवनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध रहा है, लेकिन इस पीले पलाश के खिलने से इसकी महत्ता और बढ़ गई है। लोग इस अनोखे दृश्य को देखने और कैमरे में कैद करने के लिए दूर-दूर से पहुंच रहे हैं। वनस्पति विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना आनुवंशिक परिवर्तन, जेनेटिक म्यूटेशन के कारण होती है, जिससे फूलों का रंग लाल के बजाय पीला हो जाता है। यह दुर्लभदृश्य न केवल प्रकृति की विविधता को दर्शाता है, बल्कि जशपुर क्षेत्र की समृद्ध जैव-विविधता का भी प्रमाण है।

आपको बता दें कि राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के सामाजिक वानिकी के बौंली क्षेत्र के गोल वन क्षेत्र में भी सैकड़ों केसरिया पलाश के पेड़ों के बीच दो पेड़ों पर पीले फूल खिले पाए गए हैं। पलाश को ‘फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट’ के नाम से जाना जाता है, लेकिन पीले रंग का पलाश बेहद दुर्लभ माना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा ल्यूटिया है, जो सामान्य पलाश से अलग प्रजाति है। वन विभाग के अनुसार, गोल वन क्षेत्र में करीब दो साल पहले पहली बार पीले पलाश का फूल देखा गया था और इस साल फिर से इसका खिलना बेहद खास माना जा रहा है।
पीले पलाश की यह प्रजाति संरक्षित श्रेणी में आती है और बहुत कम स्थानों पर ही देखने को मिलती है। यह एक दुर्लभ प्रजाति है, जिसे वन विभाग द्वारा संरक्षित किया जा रहा है। वनाधिकारियों के मुताबिक, पीले पलाश के बीज एकत्र कर नर्सरी में पौधे तैयार किए जाएंगे और अन्य स्थानों पर भी इसे लगाया जाएगा। पीला पलाश अधिकतर दक्षिणी क्षेत्र, जैसे उदयपुर और चित्तौड़गढ़ की ओर पाया जाता है। यह पहला मौका है जब सवाई माधोपुर जिले में दो पीले पलाश के पेड़ मिले हैं।
सामाजिक वानिकी वन विभाग की टीम ने गश्त के दौरान इस दुर्लभ पेड़ को चिन्हित कर उसके फोटो लिए और उच्च अधिकारियों को सूचना दी। इसके बाद क्षेत्र में मिले पीले पलाश के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई, जिसके चलते अब वन विभाग इसके संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान दे रहा है।

पलाश के फूल जहां अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं इनमें औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। प्राचीन समय में होली के प्राकृतिक रंग भी इन्हीं फूलों से बनाए जाते थे। फिलहाल बौंली वन क्षेत्र में मिला यह पीला पलाश न सिर्फ वन विभाग के लिए, बल्कि प्रकृति प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण बना हुआ है और आने वाले समय में इसके संरक्षण की दिशा में बड़े प्रयास किए जाएंगे।
ज्ञात हो कि धार्मिक दृष्टि से भी इस फूल को विशेष महत्व दिया जा रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसे, लक्ष्मण पलाश कहा जाता है और यह सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। आश्रम में आने वाले श्रद्धालु इसे दैवीय कृपा मानकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
