कोरबा के कार्यक्रमों पर प्रभारी मंत्री साव की गैर-मौजूदगी से राजनीतिक हलकों में चर्चा

राजनीतिक व्यस्तता है या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों की आहट ?

कोरबा 18 फरवरी। राजनीति में हर अनुपस्थिति महज कार्यक्रम से दूरी नहीं होती, कई बार वह एक संकेत होती है। एक ऐसा संकेत, जिसे सियासत अपने-अपने नजरिये से देखती और समझती है। कोरबा में पिछले कुछ दिनों से ठीक यही स्थिति दिखाई दे रही है। दो बड़े आयोजनों में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और जिले के प्रभारी मंत्री अरुण साव की लगातार गैर-मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। सवाल यह नहीं कि वे क्यों नहीं पहुंचे ? बल्कि यह है कि उनकी अनुपस्थिति आखिर क्या संदेश दे रही है ?

छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों नए समीकरण गढ़ती नजर आ रही है। पिछले एक पखवाड़े में कोरबा की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर डालें तो घटनाक्रम तेज रहे, लेकिन इस पूरे दौर में प्रभारी मंत्री अरुण साव दूरी बनाते दिखे। पिछले एक पखवाड़े में जिले में दो बड़े आयोजन हुए, लेकिन इन दोनों आयोजनों में डिप्टी सीएम साव अनुपतिस्थत रहे। पहला राजनीतिक आयोजन 2 फरवरी को भाजपा के नए कार्यालय ‘अटल स्मृति’ के भूमिपूजन का था। इस कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय समेत संगठन के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। लेकिन जिले के प्रभारी मंत्री साव कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।

आयोजन के दौरान सबसे अधिक चर्चा मंच के पोस्टर बदलने को लेकर रही। मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर लैंड होने से ठीक पहले मंच से मंत्री लखनलाल देवांगन और जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी के पोस्टर हटाकर पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडेय का पोस्टर लगा दिया गया। यह बदलाव हाईकमान की रणनीति थी या स्थानीय शक्ति संतुलन का संकेत ? यह सवाल अब भी चर्चा में है। इस आयोजन के बाद 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर जिला प्रशासन द्वारा आयोजित पाली महोत्सव में भी अरुण साव को मुख्य अतिथि बनाया गया था। इस महोत्सव का शुभारंभ डिप्टी सीएम साव को करना था, लेकिन वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके।

ऐसे में मंत्री लखनलाल देवांगन को ही उद्घाटन और समापन, दोनों की जिम्मेदारी निभानी पड़ी। खैर पाली महोत्सव का भव्य आयोजन अपनी सफलता के साथ संपन्न हो गया। लेकिन राजनीतिक गलियारे में इन बड़े आयोजनों से डिप्टी सीएम की दूरी की चर्चाएं तेज हो गयी है। कोरबा की इन राजनीतिक घटनाओं ने एक बात साफ कर दी है कि मंच की खाली कुर्सियां भी संदेश देती हैं। कोरबा के कार्यक्रमों में प्रभारी मंत्री की लगातार अनुपस्थिति को सिर्फ संयोग मान लेना आसान नहीं होगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यहीं कि क्या..यह महज राजनीतिक व्यस्तता है या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों की आहट ? इसका जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि कोरबा की सियासत में उठी ये हलचल आगे भी असर दिखाती नजर आएंगी।

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