टेलीविज़न और लोकल मीडिया का पतन: दलाली, प्रेस-रिलीज़ और चार बिस्किट की पत्रकारिता

टेलीविज़न और लोकल मीडिया का पतन: दलाली, प्रेस-रिलीज़ और चार बिस्किट की पत्रकारिता
भारत में पत्रकारिता कभी सत्ता से सवाल पूछने की कला और जनमानस की आवाज़ हुआ करती थी। पर आज, मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपने “प्रेस” कार्ड को पुलिस थाने में पहचान-पत्र की तरह और अधिकारियों की दाल-भात चखने की रसोई-पास की तरह इस्तेमाल कर रहा है। सबसे दुखद यह है कि यह गिरावट accidental नहीं, institutionalized moral collapse है।
प्रेस विज्ञप्ति पढ़कर एंकर बनने की बीमारी
आज बड़ी संख्या में “पत्रकार” वही हैं जिन्हें समाचार नहीं, प्रेस नोट पढ़ने का हुनर आता है। किसी विभाग ने ईमेल से प्रेस विज्ञप्ति भेज दी, वही कोरे शब्द कॉपी-पेस्ट कर दिए—बस पत्रकारिता पूरी। न तथ्य-परख, न डेटा जाँच, न ज़मीनी समीक्षा।
“प्रेस रिलीज़ का रट्टा मार लेने से पत्रकार नहीं बन जाता—यह पत्रकारिता का मज़ाक है।”
दूध-रहित चाय और दो बिस्कुट वाली पत्रकारिता
अधिकारियों की प्रेस-कॉन्फ्रेंस में मिलने वाली चाय और बिस्किट इनकी रीढ़ का बल खत्म कर देते हैं। तीन फोटो खिंचवाकर यह खुद को “प्रभावशाली पत्रकार” समझने लगते हैं। असल में, जिनकी पूरी औक़ात थाना-मंडी में एक बिना चालान की बाइक छुड़वा लेने भर की नहीं—वे जनता के अधिकार की लड़ाई क्या लड़ेंगे?
“जब आपकी बाइक पुलिस के पेट्रोल से और आत्मा अधिकारी की मेज़ पर रखे बिस्किट से चलती है — तब कलम बेची हुई होती है, तेज़ नहीं।”
थाने-तहसील की दलाली = पत्रकारिता का नया धंधा
पुलिस चौकी, तहसील और ब्लॉक दफ्तरों में दिनभर मंडराने वाले इन दलाल-टाइप “पत्रकारों” को असली खबरों में दिलचस्पी नहीं—सिर्फ सेटिंग, कमीशन, पास-लाभ और “तगड़ी पहचान” का नशा चाहिए।
अगर आपने भ्रष्टाचार, पीड़ित, व्यवस्था की सड़ांध और सिस्टम की नाकामी को उजागर नहीं किया — तो आप पत्रकार नहीं, सूचना-बिचौलिये हैं।
चमचागीरी का चरम: “तेजतर्रार अधिकारी” वाली खबरें
कल कोई अधिकारी नए जिले में आया, और यह “धाकड़, तेजतर्रार, कर्मयोगी, ईमानदार” जैसे विशेषणों से भरी रिपोर्ट छाप देते हैं — जैसे बचपन से इनके घर में पले हों।
“पत्रकारिता का काम सत्ता की चापलूसी नहीं, सत्ता की जांच है।”
असल पत्रकारिता क्या है?
पत्रकार वह है जो—
✔ पीड़ित की शिकायत उठाए
✔ थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाए
✔ सड़कों, बिजली, अस्पताल, शिक्षा, खनन, पानी, नगर निगम, राशन—इन सब पर सवाल उठाए
✔ व्यवस्था बदलवाए
✔ न्याय दिलवाए
समाचार वही है — जो सत्ता को असहज करे और जनता को सशक्त।
जब असली पत्रकारिता करेंगे — केस भी लगेंगे
जो सच बोलता है, उस पर हमले, मुक़दमे और दमन—इस देश में यह new normal है। पर असली पत्रकार वही है जो इस दमन के आगे न झुके, बल्कि केस करने वाले अफसर और सिस्टम की नौकरी-कुर्सी हिलाकर रख दे।
पत्रकार एकजुट क्यों नहीं? क्योंकि… डर
सबसे शर्मनाक दृश्य तब दिखता है जब किसी पत्रकार पर फर्जी मुकदमा होता है। उसका समर्थन करने के लिए ट्वीट करना तो दूर — पढ़ भी नहीं पाते।
क्यों?
जेल जाने का डर।
रीट्वीट करेंगे तो एसपी-डीएम नाराज़ हो जाएगा — यही मानसिक गुलामी इस पेशे को खोखला कर रही है।
और फिर वही लोग बाद में किसी “संगठन प्रमुख” के पैर दबाते नजर आते हैं। इस आत्महत्या-सी भीड़ में पत्रकार नहीं, डरे हुए ठेकेदार ज्यादा हैं।
पत्रकारिता छोड़ो या दलाली — दोनों साथ नहीं चल सकतीं
यदि उद्देश्य सत्य, समाज और न्याय नहीं —
तो यह पेशा छोड़ दीजिए।
भारत को बिचौलियों की नहीं, बहादुर पत्रकारों की ज़रूरत है।
जो ठान ले — कि अगर पुलिस फर्जी केस लगाएगी, तो वह केस दर्ज कराने वाले की नौकरी तक खा जाएगा। जो असली पत्रकारिता से पीछे हटे — वह माइक छोड़ रोटी-चाट का ठेला लगाए, पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ न बने।
आख़िरी बात
पत्रकारिता का पेशा आज चौराहे पर खड़ा है।
एक तरफ पदक, पहचान, पास और पावर की चमकदार फर्जी दुनिया है। दूसरी तरफ, कंधे पर ईमानदार कलम और भीड़ में अकेले चलने का साहस।
निर्णय पत्रकार को ही लेना है— “दलाली करनी है या लोकतंत्र बचाना है?” ( साभार )
