छत्तीसगढ़ी संस्कृति और अस्मिता का सौदा, मई दिवस पर एक झटके में 9 करोड़ स्वाहा, बोरे बासी की 100 रूपए की थाली का सरकारी बिल 1795 रुपए प्रति प्लेट बनाया

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रायपुर : छत्तीसगढ़ में बोरे-बासी लोगों के खान-पान का खास हिस्सा है। ‘बोरे बासी’ चावल के गुणों से भरपूर एक पौष्टिक आहार के नाम से जाना – पहचाना जाता है। इसे प्याज – चटनी के साथ परोसा जाता है। आमतौर पर डिनर के बाद रात के बचे हुए चावल को पानी में भिगोकर रख दिया जाता है।सुबह -सबेरे नाश्ते के रूप में तैयार कर इसे खाया जाता है। माना जाता है कि यह ठंडा और हल्का भोजन गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक प्रदान करता है। सबसे कम रुपयों {कीमत} में तैयार होने वाले छत्तीसगढ़ के बोरे बासी आहार को कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती ‘भूपेश’ बघेल की सरकार ने राजनैतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल कर आम जनता को खूब बरगलाया था। लेकिन अब उसकी हक़ीक़त सामने आ रही है। आम लोगों को पता पड़ रहा है कि मई दिवस {1 मई} का पर्व राज्य में कितना भारी पड़ा है। बोरे बासी आहार ने वर्ष 2018 से 2023 तक खूब सुर्खियां बटोरी थी। 

प्रदेश में बोर बासी आहार ने आम जनता को काफी प्रभावित भी किया था। इसे छत्तीसगढ़ की संस्कृति और अस्मिता से जोड़कर देखा जाने लगा था। लेकिन क्या आप जानते है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने बोरे बासी घोटाले को भी बड़ी सफाई के साथ अंजाम दिया था। प्रदेश के  सांस्कृतिक आहार का सौदा 9 करोड़ में कर पूर्व मुख्यमंत्री के गिरोह ने जमकर कमाई की। प्रदेश की गरीब जनता बघेल के माया जाल में ऐसी फंसी की बोरे बासी की 100 रूपए से भी कम की {मात्र 10 रूपए} थाली का सरकारी बिल 1795 रुपए प्रति प्लेट की दर से भुगतान किया गया। इसका खुलासा उस समय हुआ, जब विधानसभा के भीतर बोरे बासी खान -पान को लेकर एक विधायक ने प्रश्न दाग दिया। उधर बगैर देरी किये मंत्री जी ने जवाब देते हुए पूरवर्ती कांग्रेस सरकार का बोरे बासी, सदन में बिखेर दिया। उन्होंने सदन को बताया कि 9 करोड़ रूपए इस पर फूंक दिए गए। उनके मुताबिक 100 रूपए में अच्छी से अच्छी बोरे बासी खिलाई जा सकती थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस पर प्रति व्यक्ति ₹1795; रूपए खर्च किए थे।

कांग्रेस सरकार के वक्त बोरे बासी तिहार पर हुई सरकारी फिजूलखर्ची से राजनैतिक गलियारा गरमाया हुआ है। इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। विधानसभा में विधायक धर्मजीत सिंह ने इस मामले में सरकार से पूछा कि कितने मजदूरों को इस कार्यक्रम में बुलाया गया था ? बोरे बासी खिलाने पर उन पर कितना खर्च हुआ ? श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन ने सरकारी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए इस मामले मे सदन को जवाब दिया। उन्होंने बताया कि 50 हजार से अधिक मजदूरों पर 8.97 करोड़ रुपए खर्च किये गए थे, अर्थात प्रति मजदूर को बासी खिलाने में तत्कालीन सरकार ने 1795 रुपए खर्च किए थे। उन्होंने बताया कि 28 जिलों से मजदूरों के परिवहन पर कांग्रेस सरकार ने 48 लाख रुपए खर्च किये। उन्होंने इसका ब्योरा भी पेश किया।

बता दें कि देश -प्रदेश के किसी भी सामान्य भोजनालय रेस्टोरेंट में चावल से निर्मित बोरे बासी की थाली मात्र 50 से 100 रुपए में मुहैया होती है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री ने इसके लिए 18 गुना से ज्यादा का भुगतान किया था। मंत्री  लखनलाल देवांगन  ने सदन को यह भी बताया कि 1 मई 2023 को 5 घंटे के बोरे बासी तिहार में मजदूरों को खाना खिलाने पर 75 लाख और पानी पिलाने पर 27 लाख रुपए खर्च किए गए थे। उनके मुताबिक तत्कालीन सरकार ने इस दिन मजदूरों को 13 लाख की छाछ पिलाने के बिलों का भी भुगतान किया था।

छत्तीसगढ़ विधानसभा का मानसून सत्र जारी है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री के कथित भ्रष्टाचारों से कांग्रेस बैकफुट पर चली गई है। कई मौको पर बीजेपी विधायक कांग्रेस पर लगातार भारी पड़ रहे है। इसके अलावा विधानसभा में श्रम विभाग से दिए गए जवाब में एक और बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है।

सदन में एक प्रश्न के जवाब में मंत्री लखनलाल देवांगन ने बताया कि मजदूरों को लाने के लिए स्वल्पाहार 15.94 लाख रुपए खर्च किए गए थे। उन्होंने कहा कि रायपुर में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें सबसे अधिक 4.47 लाख रुपए नाश्ते पर खर्च किये जाने का दावा सरकारी रिकॉर्ड में किया गया है। उनके मुताबिक कार्यक्रम ख़त्म होने के दूसरे दिन भी मजदूरों को सुबह के नाश्ते के नाम पर 150 रुपए प्रति थाली का भुगतान किया गया था।

रायपुर के साइंस कॉलेज में आयोजित एक दिवसीय बोरे बासी कार्यक्रम में 1.3 लाख मजदूरों को लाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसकी तुलना में लगभग 50 हजार श्रमिक शामिल हुए थे। ऐसे में एक दिन में 9 करोड़ का बोरे बासी त्यौहार गरीबो और मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और छलावे के रूप में देखा जा रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि साइंस कॉलेज मैदान में हुए कार्यक्रम में रायपुर के ही मजदूरों को लाने में 13 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। जबकि दूरस्थ अंचल बस्तर से मजदूरों को लाने में 46 हजार और सरगुजा से रायपुर लाने में 65000 रुपए ही खर्च हुए थे।

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