नाबालिग को वयस्क मानकर न्यायालय द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को उच्च न्यायालय ने किया निरस्त

कोरबा 25 जून। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग को वयस्क मानकर सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया है। न्यायाधीश संजय अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि आईपीसी की धारा 307 यानी हत्या का प्रयास के तहत अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इसमें न्यूनतम 7 साल की सजा का प्रावधान नहीं है। मामला कोरबा जिले का है।
बताया जा रहा हैं की उच्चतम न्यायालय ने भी पहले इस संबंध में आदेश जारी किया है, जिसके आधार पर डिवीजन बेंच ने यह फैसला दिया है। उच्च न्यायालय ने इस फैसले की कॉपी सभी चिल्ड्रन कोर्ट और बाल कल्याण बोर्ड को भेजने के निर्देश दिए हैं।
जानकारी के अनुसार कोरबा जिले में एक 17 साल के किशोर के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया था, जिस पर पुलिस ने किशोर न्याय बोर्ड में चालान पेश किया था। बोर्ड ने कथित आरोपी की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच मानते हुए मामले को जघन्य अपराध की श्रेणी में लिया और प्रारंभिक मूल्यांकन के बाद इसे चिल्ड्रन कोर्ट को भेज दिया। चिल्ड्रन कोर्ट ने किशोर को वयस्क मानते हुए ट्रायल किया। जिसके बाद 27 सितंबर 2017 को दिए गए फैसले किशोर को धारा 307 के तहत दोषी करार दिया और उम्रकैद और 2 हजार रुपए का जुर्माना की सजा सुनाई।
इस फैसले के खिलाफ किशोर ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील की गयी। इसमें कहा कि उसे प्रारंभिक मूल्यांकन की रिपोर्ट की कॉपी नहीं दी गई। न ही रिपोर्ट पर जवाब देने का मौका मिला। इसके अलावा चिल्ड्रन कोर्ट ने भी स्वतंत्र रूप से कोई जांच नहीं की और उसे सीधे दोषी करार दे दिया।
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय के शिल्पा मित्तल मामले का हवाला देते हुए कहा है कि किसी अपराध को तभी जघन्य माना जाएगा, जब उसमें न्यूनतम 7 वर्ष की सजा का प्रावधान हो। आईपीसी की धारा 307 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। लिहाजा, इसे गंभीर अपराध माना जाएगा, न कि जघन्य। जब अपराध गंभीर हो तो किशोर न्याय बोर्ड को ही मुकदमे की सुनवाई करनी चाहिए। चिल्ड्रन कोर्ट को केस भेजना उचित नहीं था।
उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि चिल्ड्रन कोर्ट ने किशोर को रिहाई की संभावना के बिना उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह जेजे एक्ट की धारा 21 का सीधा उल्लंघन है। कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी किशोर को ऐसी सजा नहीं दी जा सकती जो रिहाई की संभावना को खत्म करे। इसलिए किशोर के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड को ही करनी थी, न कि चिल्ड्रन कोर्ट को। उच्च न्यायालय ने इस फैसले की एक कापी राज्य के सभी बाल न्यायालय और बाल कल्याण बोर्डों को भेजने के निर्देश दिए ताकि भविष्य में इस तरह की प्रक्रियागत चूक दोहराई न जाए।
