प्रारम्भ से ही भारत के प्रतिकूल रहा है- सिन्धु जल संधि, कश्मीर का विकास हुआ प्रभावित

नई दिल्ली. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जिस सिंधु जल संधि को रद्द किया, वह शुरू से ही भारत के लिए अनुकूल नहीं थी। भारत को सिंधु बेसिन क्षेत्र के आधार पर सिंधु व सहायक नदियों का 35 प्रतिशत पानी मिलना चाहिए था, लेकिन मिला 20 प्रतिशत ही। 1960 का यह जल बंटवारा पाकिस्तान को गैर वाजिब फायदे देता रहा।

भारत के साथ पक्षपात यहीं नहीं रुका, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में नई नहरें बनाने के लिए भारत से 6,20,60,000 करोड़ पाउंड भी लिए गए। उस वक्त 1 पाउंड करीब 15 रुपए के बराबर था। इस संधि के अनुच्छेद 5.1 के तहत थोपी गई रकम भारत ने 10 किस्तों में अदा की। इसी दौरान 1965 की जंग भी अदा होती रही। इस पक्षपात के बावजूद 12 अनुच्छेद में बंटी यह संधि भारत ने पूरी ईमानदारी से निभाई। इसी वजह से इसे दुनिया की सबसे सफल जल संधि भी कहा जाता है। अहसान फरामोश पाकिस्तान इस पक्षपाती संधि के फायदे तो उठाता ही रहा और सिंधु व झेलम नदियों पर कई परियाजनाओं में अड़ंगे लगाए जिससे कश्मीर का विकास प्रभावित हुआ।

© सलाल पनबिजली परियोजनाः चिनाब नदी पर 1970 में शुरू हुई इस परियोजना से 690 मेगावाट बिजली उत्पादन होना था। पाकिस्तान के विरोध के कारण देरी हुई, भारत को इसकी ऊंचाई घटानी पड़ी।

© तुलबुल परियोजना : 80 के दशक में पाकिस्तान ने इस परियोजना को झेलम नदी पर मानव निर्मित बाधा करार दिया। भारत ने 1987 में यहां काम रोक दिया। परियोजना आज तक अधूरी है।

30% पानी जाता बेकार

पाकिस्तान में खराब नहरों, अविकसित सिंचाई प्रणालियों और बांधों की कमी की वजह से उसे मिल रहे सिंधु के 80% पानी में से 30% पानी बहकर समुद्र में चला जाता है। मानसून में उसका बड़ा हिस्सा बाढ़ में डूब जाता है।

पाकिस्तान के लिए हमेशा खौफ

पाकिस्तान को डर रहा है कि भारत रणनीतिक स्थिति की वजह से सिंधु व सहायक नदियों पर बांध बनाकर इनका पानी युद्ध के समय हथियार की तरह उपयोग कर सकता है, सूखा या बाढ़ ला सकता है। प्रधानमंत्री मोदी 2016 में यह बयान देकर उसे और डरा चुके हैं कि पानी और खून साथ साथ नहीं बह सकते।

Spread the word