कविता : हे राम!
@ डा. सुधीर सक्सेना

हे राम !
-डा. सुधीर सक्सेना
वह सत्य के लिए जिया
कहा उसने फिर-फिर
‘सत्य ही ईश्वर है’
औरों ने कहा-
ईश्वर ही सत्य
उसने कहा-
सत्य ही राम, सत्य ही रहीम
उसने सत्य को दी
वरीय चीजों पर वरीयता
आते रहे रहनुमा
जाते वक्त उनके होठों से निकले
अलग-अलग शब्द,
कइयों के तो फूटे ही नहीं बोल
कई रहे निःशब्द मौन
और कुछ भले ही आसां हो,
मगर, आसान नहीं होता सचाई से इश्क
दुश्वारियों से भरी दुनिया में
सबसे कठिन है थामे रहना
सचाई की बाँह
सत्य को समर्पित हो
मन, वचन, कर्म से
और
रूह में पिन्हा हो सत्य
तब कहीं जाकर
सहस्राब्दियों के अंतराल में
फूटता है
किसी महात्मा के होठों से
बरबस-
‘हे, राम !’
