अमेरिका-ईरान में युद्ध विराम @ डॉ. सुधीर सक्सेना

ट्रंप रजामंद ना होते तो क्या करते?

डॉ. सुधीर सक्सेना

अंततः महाविनाश की आशंकाओं और दोनों गोलार्द्धों में धुकधुकी के बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हो गया। लेकिन सच यह है कि अमेरिका और ईरान के दरम्यां जंग चौदह दिनों के लिए टली है, खत्म नहीं हुई है। इसकी झलक अमेरिका और इस्रायल के साझा आक्रमण के शिकार हुए ईरान के उस दस सूत्री प्रस्ताव में मिलती है, जिस पर अमेरिका के बड़बोले और दंभी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तब रजामंदी जाहिर की, जब ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देने की उनकी मोहलत में कुछ ही घंटे शेष थे। उनकी धमकी ने यह उजागर कर दिया था कि उन्नत लोकतंत्र के महाबली राष्ट्र के मुखिया होने के बावजूद ट्रंप के मन में मानव जीवन, सभ्यता और संस्कृति के प्रति कोई सम्मान शेष नहीं है और वह अपनी ज़िद या खब्त में कुछ भी दांव पर लगा सकते हैं।

करीब 40 दिन चली जंग के घटनाक्रम पर गौर करें तो 28 फरवरी के शुरुआती दौर में अयातुल्लाह खामनेई और अली लारीजानी की मृत्यु के बाद कुछ भी अमेरिकी मंशा के अनुरूप नहीं हुआ। ईरान में कू-दे-ता खामख्याली रहा और पेजेश्कियान, अरघाची और गालीबफ के सम्मिलित नेतृत्व में ईरान ने अमेरिका और इस्रायल से बखूबी पंजा लड़ाया और घुटने टेकने के बजाय करारे प्रत्यक्रमण से उनकी व्यूह-रचना के अंजर-पंजर ढीले कर दिए। इससे वियतनाम और अफगानिस्तान की भांति ईरान भी अमेरिकी गरूर चकनाचूर करने वालों की गर्वीली और विरल पांत में खड़ा हो गया। ईरान ने इस्रायल का आयरन डोम ही नहीं भेदा, बल्कि दियागोगार्सिया तक प्रहार कर अमेरिका की पेशानी पर पसीना ला दिया। ईरान के कामयाबी से किला लड़ाने का नतीजा यह हुआ कि ट्रंप को अपने पांव पीछे खींचने पड़े। अमेरिका में उनका विरोध दिनोंदिन सघन होता जा रहा था और उन्हें सबसे निकृष्ट या बदतर राष्ट्रपति की संज्ञा दी जा रही थी, तथा उनके खिलाफ अविश्वास या महाभियोग की संभावना उठ खड़ी हुई थी। ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने उनसे किनारा कर लिया था और नाटो में दरारें उभर आई थीं। स्वयं अमेरिका ने अपने अनेक कीमती विमान गंवाए। युद्ध का लंबा और खर्चीला होना उसके लिए घाटे का सौदा था। दूसरे, यूएई, सऊदी अरब, कतर, बहरीन, ओमान आदि देश सुरक्षा के लिए उस पर अपना भरोसा गंवा चुके थे। यद्यपि अभी भी अमेरिका इस्रायल के अलावा किसी भी अरब या खाड़ी देश का सगा नहीं है, किन्तु यह एहसास लगातार गहरा हो रहा था कि ट्रंप ने ‘बिबी’ के उकसावे में आकर भूल-गलती की। ऐसे में अशिष्टता की हदों को लांघ चुके ट्रंप के सामने और कोई चारा नहीं था कि वह युद्धविराम पर राजी हों। देश-दुनिया में ट्रंप और अमेरिका की ऐसी भद्द पिटने का किसी को गुमान न था।

इस सारे घटनाक्रम का अहम पहलू यह है कि आतंकवादी राष्ट्र (पाकिस्तान) के फौजी शासक फील्ड मार्शल मुनीर के माथे तात्कालिक शांति का सेहरा बंधा। मध्य पूर्व में राजनय में भारत नितांत विफल रहा। लेकिन जंग से कुछ घंटे पूर्व नेसेट में सम्मानित मोदी का इस्रायल को फादरलैंड कहना और जयशंकर का मध्यस्थता को दलाली बताना अनौचित्यपूर्ण था। बहरहाल, युद्धविराम के बावजूद इस्रायल की दक्षिण लेबनान में बमबारी दर्शाती है कि तेल अवीव ने ग्रेटर इस्रायल की मुहिम त्यागी नहीं है। यकीनन उसे अपनी रणनीति नये सिरे से बनानी होगी।

जंग के फलस्वरूप होर्मुज जलडमरूमध्य के रूप में ईरान को ब्लैंक चेक मिल गया है। वह होर्मुज पर नियंत्रण तो रखेगा ही, हर जहाज से दो मिलियन डॉलर चुंगी भी वसूलेगा। यह सन 1956 के स्वेज प्रसंग की याद दिलाता है। यह जंग नव-उपनिवेशवादी अमेरिका के वर्चस्व के क्रमिक अंत और मॉस्को–बीजिंग–तेहरान धुरी की मजबूती की शुरुआत है।

करीब डेढ़ करोड़ ईरानियों का शहादत के लिए पंजीयन, लाखों ईरानियों का मानव श्रृंखला बनाना और ईरानी सिने-निर्माता जफर पनाही का युद्ध की लपटों के बीच वतन लौटना मानीखेज घटनाएं हैं। बारूदी धुएं और धमाकों के बीच अली घनसारी का तार पर छेड़ा अमन का राग सदियों तक फिजाओं में गूंजता रहेगा—अलबत्ता आइए हम दुआ करें कि युद्धविराम से शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

लेखक: डॉ. सुधीर सक्सेना
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