कोरबा में बिजली घरों की राख से पर्यावरण और जन जीवन खतरे में

गेंदलाल शुक्ल
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में जिस औद्योगीकरण को वरदान समझा जा रहा था समय के साथ वह अभिशाप में तब्दील होता जा रहा है। करीब आठ दशक पहले कोयला उत्खनन के साथ प्रारंभ हुआ कोरबा का औद्योगिकरण बिजली घरों, एल्यूमिनियम संयंत्र और अन्य छोटे बड़े उद्योगों की स्थापना के साथ प्रवासी वर्गों को तो सम्पन्नता के शिखर पर पहुंचने का अवसर मिला, लेकिन यहां के मूल निवासी इस विकास के प्रतिसाद से अब तक वंचित है।
इस अवधारणा को बल देने के लिए अनेक उदाहरण हैं। ताजा उदाहरण करतला तहसील के घाटाद्वारी ग्राम पंचायत का है। सोमवार 22 सितंबर को घाटाद्वारी के ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंप कर बिजली घरों से निकलने वाली जहरीली राख का निस्तारण गांव में किए जाने की शिकायत की। ग्रामीणों ने गांव की जमीनों में जहरीली राख डंप करने पर रोक लगाने और राख की वजह से गांव के किसानों के खेतों में पहुंची क्षति की भरपाई करने की मांग की।

दरअसल इस गांव में पूर्व में पत्थर खदानें संचालित थी। पत्थर निकल जाने की वजह से अब वहां पर बड़े- बड़े गड्ढे हो गए हैं। बिजली घरों से निकलने वाली राख को इन्हीं गड्ढों में भरकर समतल किए जाने के लिए राख परिवहन करने वाले ठेकेदारों को प्रशासनिक अनुमति दी गई थी। इन गड्ढों में राख भरने के बाद ठेकेदारों ने गांव की गोचर जमीन पर मिट्टी हटाकर एक तरह से बांध बना दिया और उस पर राख भरने लगे। जमीन के सतह के बराबर राख भरकर इन गड्ढों को समतल कर छोड़ दिया जाता तो ग्रामीणों को कोई आपत्ति नहीं होती। परंतु ठेकेदारों ने गड्ढों के ऊपर राख का पहाड़ की तरह टीला बना दिया। नतीजा यह हुआ कि अब भारी मात्रा में यह राख पानी बरसने पर कट कर किसानों के खेतों में पहुंच जा रहे हैं। इससे किसानों की खेती नष्ट हो रही है। ग्रामीणों ने अपना विरोध दर्ज कराया तो फौरी तौर पर ठेकेदारों ने काम बंद कर दिया है। किंतु किसानों की फसल को पहुंची क्षति का उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया गया है।
कोरबा जिले में बिजली घरों की राख से कृषि फसलों को क्षति पहुंचने का यह पहला मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के कोरबा पूर्व राखड़ बांध से हर साल गोढी और पड़ोसी गांव के किसानों की फसल इस जहरीली राख के कारण प्रभावित होती है। एन टी पी सी के धनरास राखड़ बांध और विद्युत मंडल दर्री के लोतलोता राखड़ बांध से भी प्रति वर्ष किसानों की फसल बर्बाद होती है। गर्मी के दिनों में बांध से उड़ने वाली राख का प्रदूषण कोरबा शहर सहित जिले के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करता है।

सबसे भयावह नजारा 2018 से 2023 के बीच पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौर में देखा गया। नेताओं, नौकरशाहों, उद्योग प्रबंधनों और अर्थ -पिशाचों के नापाक गठबंधन ने कोरबा जिले के चप्पे – चप्पे को जहरीली राख से रंग दिया था। उद्योगों को इस दौर में कितना अतिरिक्त आर्थिक भार वहन करना पड़ा, यह वही बता सकते हैं। इधर, छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ उम्मीद की जा रही थी, कि हालात और सूरत बदलेंगे, किन्तु यह हुआ नहीं। कम से कम कोरबा जिले में तो सब कुछ पूर्ववत ही है। कुछ नए और कुछ पुराने चेहरों की जुगलबंदी में इतिहास खुद को दोहरा रहा है।
इस त्रासद स्थिति के लिए उद्योग प्रबंधनों को जिम्मेदार मानना पूरी तरह से उचित नहीं होगा। पिछले 30 वर्षों से बिजली घरों का प्रबंधन राख के निस्तारण के लिए राखड़ बांध बनाने, शासन से भूमि की मांग कर रहे हैं। परन्तु किसी भी निजी और शासन के उपक्रम को भूमि नहीं मिल रही है। पुराने राखड़ बांध की क्षमता खत्म हो गई है। उत्पादन की तुलना में वैकल्पिक कार्यों में राख की खपत कम हो रही है। लिहाजा, जहरीली राख का निस्तारण प्रशासन के सहयोग से नदी नालों, जंगलों आदि में किया जा रहा है। राख परिवहन करने वाले ठेकेदार या तो स्वयं राजनीतिक दल के प्रभावी नेता हैं या किसी बड़े नेता की छत्रछाया और संरक्षण में प्रदूषण का व्यापार कर रहे हैं। कुल मिलाकर कोरबा जिला पर्यावरण की दृष्टि से लगातार बद से बदतर होता जा रहा है। आम नागरिक समय समय पर इसके खिलाफ शासन और प्रशासन में शिकायत करते हैं, लेकिन उनकी गुहार अनसुनी रह जाती है।
