भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने पर बनी सहमति

एससीओ में पीएम मोदी और चिनफिंग की मीटिंग से मजबूत होंगे दोनों देश के रिश्ते
नईदिल्ली 20 अगस्त (RNS)। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का स्थाई हल निकालने पर विमर्श करने के लिए विशेष प्रतिनिधि (एसआर) स्तर की 24वें दौर की वार्ता मंगलवार को संपन्न हुआ। वार्ता राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की अध्यक्षता में हुई। इस बैठक में कोई समाधान तो नहीं निकला लेकिन भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर चिन्हित किया गया है। एसआर स्तर की यह वार्ता वर्ष 2019 के बाद नहीं हुई थी लेकिन पिछले आठ महीनों में यह दूसरी बैठक थी। यह बताता है कि वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ से जो स्थिति बनी थी, उससे आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति दोनों तरफ से दिखाई जा रही है। इस बैठक में मुख्य रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, सैन्य तनाव को कम करने, और आपसी भरोसे को बढ़ाने के उपायों पर चर्चा हुई। डोभाल ने कहा कि पिछले अक्टूबर में रूस के कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शााचनाफग का मुलाकात क बाद बना सहमात न दाना दशा का नइ दिशा दी है। उन्होंने जोर दिया कि पिछले नौ महीनों से सीमा पर शांति बनी हुई है, जिससे दोनों देशों को विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति का अवसर मिला है। एनएसए ने अपने भाषण में यह जानकारी दी कि पीएम मोदी शीघ्र ही चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। इसी तरह से वांग यी ने स्वीकार किया कि हाल के वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में आई रुकावटें दोनों के हित में नहीं थीं। उन्होंने कहा कि अब समय है कि दोनों पक्ष भरोसा और सहयोग बढ़ाएं। बैठक में सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाने, तनाव को रोकने, और सीमा पार व्यापार को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ। वांग यी ने कहा कि चीन पीएम नरेन्द्र मोदी की आगामी चीन यात्रा को काफी महत्वपूर्ण मानता है। मोदी चीन के शहर तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने वाले हैं। डोभाल ने इस अवसर पर भविष्य में रचनात्मक संवाद को जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई। यह वार्ता प्रधानमंत्री मोदी की आगामी तियानजिन में होने वाली एससीओ शिखर सम्मेलन की यात्रा से पहले हुई, जो दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय संवाद को और मजबूत कर सकती है।
