चौतुरगढ़ आज भी इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों को करता है आकर्षित

कल्चुरी कालखंड की पुरा संपदा देती है इतिहास को दृष्टि
कोरबा 08 मई। जिले का अतीत वैभव, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि के मामले में काफी गौरवशाली रहा है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र केवल प्राकृतिक संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और मजबूत निर्माण कला के लिए भी पहचाना जाता था। कलचुरी शासनकाल के दौरान यहां अनेक मंदिरों, दुर्गों और धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया गया, जिनके अवशेष आज भी उस दौर की समृद्ध संस्कृति और तकनीकी दक्षता की कहानी बयां करते हैं।
चौतुरगढ़ किला इसका प्रमुख उदाहरण है। समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित यह किला लगभग नवमी सदी में निर्मित माना जाता है। दुर्ग के टूटे हुए अवशेष आज भी उस समय की उन्नत वास्तुकला, सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत निर्माण तकनीक की झलक प्रस्तुत करते हैं। किले तक पहुंचने वाले रास्ते, पत्थरों की संरचना और ऊंचाई पर इसकी रणनीतिक स्थिति यह दर्शाती है कि तत्कालीन शासकों ने सुरक्षा और स्थापत्य दोनों पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया था। चौतुरगढ़ में बने तीन प्राचीन द्वारों में ‘छत्तीसगढ़ का सिंह द्वार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। विशाल पत्थरों से निर्मित ये द्वार आज भी इतिहास के जीवंत साक्ष्य की तरह खड़े हैं। समय और मौसम की मार के बावजूद इन संरचनाओं की मजबूती लोगों को उस युग की निर्माण क्षमता का एहसास कराती है।
इस ऐतिहासिक क्षेत्र का भ्रमण करने पहुंचे जितेंद्र सारथी ने अपनी टीम के साथ यहां मौजूद प्राचीन अवशेषों, किले की संरचना और ऐतिहासिक महत्व को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि कोरबा का यह क्षेत्र पर्यटन और इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी भी इसे व्यापक पहचान और संरक्षण की आवश्यकता है। प्राकृतिक सौंदर्य, पहाडियों और जंगलों के बीच स्थित चौतुरगढ़ आज भी इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह स्थल न केवल कोरबा जिले की ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए है, बल्कि आने वाली पीढियों को अपनी गौरवशाली संस्कृति से परिचित कराने का माध्यम भी बना हुआ है।
