सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं कर सकते: संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली. सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश व धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दसवें दिन भी सुनवाई हुई। 9 जजों की संविधान पीठ ने एडवोकेट इंदिरा जयसिंह की दलीलों के जवाब में कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा, आस्था व अंतरात्मा के मामलों को न्यायिक बहस का विषय नहीं बनाया जा सकता।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने उन दो महिलाओं की ओर से दलीलें रखीं, जिन्होंने 2018 के फैसले के बाद सबरीमला मंदिर में प्रवेश किया था। जयसिंह ने तर्क दिया कि अदालतें धार्मिक मामलों से पूरी तरह ‘हाथ खींच’ नहीं सकतीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल विशेषता है। उनके अनुसार, संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और मौलिक अधिकारों की व्याख्या अलग-थलग नहीं की जा सकती।
धर्म समय के साथ विकसित होता है, और स्थिर नहीं रहता। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद 25 (2) (बी) सामाजिक . सुधार के लिए राज्य को कानून बनाने की अनुमति देता है, लेकिन यह अपने आप में कोई मौलिक अधिकार नहीं है। उन्होंने टिप्पणी की, ‘सुधार के नाम पर धर्म को खोखला मत कीजिए। सदियों से चले आ रहे अनुष्ठानों और परंपराओं को यूं ही नहीं खोला जा सकता।
जयसिंह ने ‘एसेंशियल रिलीजन प्रैक्टिस’ (आवश्यक धार्मिक प्रथा) परीक्षण को पूरी तरह खत्म करने ने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि अदालतों को यह देखना होगा कि किसी प्रथा को हटाने से धर्म के मूल स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा। हालांकि, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला सुंदरेश ने कहा कि इस परीक्षण को लागू करते समय अदालतों को अत्यंत सतर्क रहना होगा, जबकि जस्टिस पी. एस. अमानुल्लाह ने चिंता जताई कि ऐसा करने पर अदालतें ‘धर्मशास्त्री’ की भूमिका निभाने लगेंगी। मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।
