कही-सुनी (12 APRIL-26) : रवि भोई

कब निकलेगा स्थायी डीजीपी का आदेश ?


छत्तीसगढ़ के स्थायी डीजीपी का आदेश एक पहेली बन गया है। बताते हैं संघ लोक सेवा आयोग ने राज्य के स्थायी डीजीपी के लिए 1992 बैच के आईपीएस अरुणदेव गौतम और 1994 बैच के आईपीएस हिमांशु गुप्ता का नाम प्रस्तावित किया है। अब छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को इन दोनों में से एक को चुनना है। यूपीएससी की चिट्ठी के बाद स्थायी डीजीपी की नियुक्ति के लिए हलचल शुरू हुई, पर एक हफ्ते बाद भी शीर्ष स्तर पर मामला ठंडे बस्ते में पड़ा है। कहते हैं स्थायी डीजीपी पर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को लेना है, इस मामले में गृह मंत्री विजय शर्मा की भी बड़ी भूमिका होगी। खबर है कि अदृश्य शक्ति के दबाव में स्थायी डीजीपी की नियुक्ति का मामला लटका पड़ा है। अरुण देव गौतम को प्रभारी डीजीपी बने एक साल से ज्यादा समय हो गया है। वे जुलाई 2027 में रिटायर हो जाएंगे। जानकारों का कहना है कि अरुणदेव की नियुक्ति में एक पेंच फंस रहा है डीजीपी के कार्यकाल को लेकर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक़ डीजीपी का कार्यकाल न्यूनतम दो साल होना चाहिए। अब अरुणदेव गौतम को डीजीपी बनाते हैं तो प्रभारी डीजीपी की अवधि को भी कार्यकाल माना जाय या फिर जब से स्थायी डीजीपी बनेंगे तब से दो साल कार्यकाल मिलेगा। स्थायी डीजीपी के मामले में लेटलतीफी समस्या बन गई है।
भाजपा के दुखी विधायक
कहते हैं अदृश्य और खुलेआम विरोध करने वालों को पार्टी में महत्व और सरकार में पद मिलने से भाजपा के कुछ विधायक इन दिनों बड़े दुखी और अपने को असहाय समझने लगे हैं। चर्चा है कि रायपुर संभाग के एक विधायक का 2023 के चुनाव में विरोध करने वाले दो नेताओं को पार्टी ने सत्ता में भागीदार बना दिया है। इससे विधायक जी बड़े दुखी हैं। विधायक जी भाजपा के जड़ से पैदा होने वाले नेता नहीं हैं। वे हवाई लेंडिग वाले नेता हैं, इस कारण भी उन्हें कड़वा घूंट पीने में थोड़ी तकलीफ हो रही है। बताते हैं सत्ता में भागीदार बने दोनों नेता भी कोई भाजपा के जड़ वाले नहीं हैं, पर विधायक से पहले पार्टी से जुड़े हैं और टिकट के बड़े दावेदार थे। नए-नवेले के उम्मीदवार बनाया जाना दोनों को ही नहीं भाया था। अब दोनों को पद मिलना विधायक जी को नहीं भा रहा है। एक विधायक अपने छद्म विद्रोहियों से इतने दुखी हो गए कि मंच से ही उनके लिए आग उगलने लगे। अब भाजपा के बड़े नेता दुखी विधायकों के आंसू किस तरह पोछते हैं, देखना होगा।
डीजी के तीन पद बनाए जाने की चर्चा
कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में पुलिस महानिदेशक के तीन नए पद सृजित किए जाने की जुगत चल रही है। अभी राज्य में डीजी के चार पद हैं। एक्स कैडर तीन पद बन जाएंगे,तो सात डीजी हो जाएंगे। यह अलग बात है कि सरकार पिछले एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी एक डीजी को कोई काम नहीं दे पाई है और बिना काम के ही लाखों रुपए खर्च कर रही है। डीजी के चार पदों में अरुणदेव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता पदस्थ हैं। इनमें अरुणदेव गौतम प्रभारी डीजीपी हैं। बताते हैं 1994 बैच के एसआरपी कल्लूरी,1995 बैच के प्रदीप गुप्ता और 1996 बैच के विवेकानंद सिन्हा को डीजी बनाने के लिए पद सृजित करने की बात चल रही है। 1994 बैच के जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता डीजी हैं। एसआरपी कल्लूरी छूटे हैं। भारत सरकार की मंजूरी पर भी मामला निर्भर है। डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में भारत सरकार की अनुमति के बिना राज्य सरकार ने मुकेश गुप्ता और आर के विज को स्पेशल डीजी बना दिया गया था। कहा जाता है भारत सरकार की आपत्ति के बाद दोनों को फिर एडीजी बनाना पड़ा था ।
मक्सी कुजूर क्यों पिछड़ गए ?
चर्चा का विषय है कि दौड़ में आगे रहने के बाद भी चीफ इंजीनियर मक्सी कुजूर प्रभारी प्रमुख अभियंता क्यों नहीं बन पाए और शंकर ठाकुर की लाटरी लग गई। शंकर ठाकुर 30 जून को रिटायर हो जाएंगे। तीन महीने के लिए प्रभारी ईएनसी बने शंकर ठाकुर का नाम वरिष्ठता क्रम में सबसे ऊपर है। इसके बाद मक्सी कुजूर का नाम है। बताते हैं कि प्रभारी ईएनसी की दौड़ में चीफ इंजीनियर सतीश कुमार टीकम भी शामिल हो गए थे। टीकम को एक भाजपा विधायक का संबंधी बताया जाता है। वरिष्ठता सूची में टीकम का नाम सबसे नीचे है। विवाद में पड़ने की जगह सबसे वरिष्ठ चीफ इंजीनियर को प्रभारी ईएनसी बना दिया गया। मक्सी कुजूर मंत्रालय में जल संसाधन विभाग में ओएसडी थे, उन्हें फिलहाल महानदी परियोजना का चीफ इंजीनियर बना दिया गया है। मक्सी कुजूर के मंत्रालय से बाहर जाने के बाद जल संसाधन विभाग में ओएसडी का पद खाली हो गया है। ओएसडी पद पर कुछ एस ई और ई ई नजरें गड़ाए हुए हैं , अब देखते हैं किसका नंबर लगता है।
डीजीपी के आदेश से चल रहा पुलिस महकमा
रायपुर ग्रामीण,गरियाबंद,कोंडागांव और जांजगीर-चांपा जिलों में कामचलाऊ एसपी की पोस्टिंग प्रभारी डीजीपी के आदेश से ही हो गया। यहां पदस्थ प्रमोटी आईपीएस कार्यमुक्त होकर ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद चले गए। बताते हैं कि पुलिस मुख्यालय ने चारों जिलों में तदर्थ एसपी की पोस्टिंग और वहां कार्यरत एसपी को कार्यमुक्त करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था, लेकिन शासन की तरफ से अब तक कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। पुलिस मुख्यालय का प्रस्ताव गृह सचिव से गृह मंत्री होते हुए मुख्यमंत्री तक जाएगी। सुनते हैं कि फाइलों को ऑनलाइन निपटाने की व्यवस्था के बाद भी निर्णय में विलंब को देखते प्रभारी डीजीपी ने अपने तरफ से आदेश जारी कर खानापूर्ति कर दी। आमतौर पर जिलों में पोस्टिंग मुख्यमंत्री के निर्देश पर होती है। प्रभारी डीजीपी के आदेश पर चार जिलों में एसपी की पोस्टिंग की मंत्रालय और पुलिस महकमें में बड़ी चर्चा है और इसे नई प्रथा का आगाज बताया जा रहा है।
तीन मंत्री ख़ुफ़िया एजेंसियों की निगाह में
कहते हैं राज्य के तीन मंत्री अलग-अलग कारणों से केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसियों की निगाह में चढ़ गए हैं। तीनों मंत्रियों की रिपोर्ट भाजपा हाईकमान को भेज दी गई है। कहा जा रहा है कि इन मंत्रियों के विभागों में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की भारी शिकायतें हैं। माना जा रहा है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद मंत्रिमंडल के संभावित फेरबदल में इन तीनों मंत्रियों का विभाग बदल सकता है या फिर उनको ड्राप भी किया जा सकता है। अब देखते क्या होता है, पर एक बात तो साफ़ है कि मंत्रियों के पीछे कई आँख लगी हुई हैं।
हिमंता मामले में छग का एक कांग्रेस नेता सुर्ख़ियों में
कहते हैं कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी के पासपोर्ट मामले में छत्तीसगढ़ के एक कांग्रेस नेता भी सुर्ख़ियों में हैं। इस मामले में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा फिलहाल उलझे हुए हैं। भले ही उन्हें तेलंगाना हाईकोर्ट से कुछ दिनों की राहत मिल गई है। बताते हैं छत्तीसगढ़ के एक कांग्रेस नेता ने पवन खेड़ा के प्रेस कांफ्रेंस लेने से कुछ दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफार्म में इस मामले में खबर डाला था। अब देखते हैं छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता पर आंच आती है या फिर पाक साफ़ बच जाते हैं। वैसे छत्तीसगढ़ के ये कांग्रेसी नेता पहले भी सुर्ख़ियों में रहे हैं।

(लेखक पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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