विख्यात लेखक और संपादक ज्ञानरंजन नहीं रहे, शोक

जबलपुर। विख्यात लेखक और साहित्यिक पत्रिका “पहल” के संपादक ज्ञानरंजन का दुखद निधन हो गया।
इस खबर से कलमकारों शोक की लहर है। ज्ञानरंजन के निधन के साथ ही एक युग का भी अवसान हो गया।
आपको बता दें कि ज्ञानरंजन (जन्म 21 नवंबर, 1936) साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख हिन्दी कथाकार और “पहल” पत्रिका के यशस्वी संपादक थे, जिन्होंने अपनी तीखी यथार्थवादी कहानियों, विशेषकर मानवीय संबंधों के विघटन और आंतरिक अंधेरों की पड़ताल के लिए ख्याति पाई; उन्होंने “कबाड़खाना” जैसी महत्वपूर्ण रचनाएँ दीं और अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त किए, साथ ही आपातकाल का विरोध कर ‘पहल‘ पत्रिका को 35 वर्षों तक संपादित किया, जिससे हिन्दी साहित्य में उनका स्थान अमिट है.
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
- जन्म: 21 नवंबर, 1936 को महाराष्ट्र के अकोला में हुआ.
- प्रारंभिक जीवन: उनका बचपन और शुरुआती जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बीता.
- उच्च शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की.
साहित्यिक योगदान
- कथाकार: वे साठोत्तरी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक माने जाते हैं, जो ‘चार यार’ (ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया) के रूप में प्रसिद्ध थे.
- कहानी संग्रह: उनके प्रमुख कहानी संग्रहों में ‘फेंस के इधर और उधर‘, ‘क्षणजीवी‘, और ‘सपना नहीं‘ शामिल हैं; उनकी कुल 25 कहानियाँ ‘सपना नहीं’ में संकलित हैं.
- गद्य रचनाएँ: उनकी अनूठी गद्य रचना ‘कबाड़खाना’ बहुत लोकप्रिय हुई.
- अनुवाद: उनकी कहानियाँ भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, रूसी, पोलिश, जापानी आदि विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हुई हैं और कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं.
संपादन और “पहल” पत्रिका
- “पहल” का संपादन: उन्होंने 35 वर्षों तक ‘पहल’ नामक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया, जो आपातकाल के दौरान भी जारी रहा और बाद में कुछ समय के लिए बंद होने के बाद फिर शुरू हुई.
- निष्ठा: वे कार्य के प्रति अत्यंत निष्ठावान थे और ‘पहल’ के माध्यम से हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
सम्मान और पुरस्कार
- उन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’, ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’, ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया.
- उन्होंने आपातकाल के विरोध में मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग का एक पुरस्कार और मुक्तिबोध फेलोशिप अस्वीकार कर दिए थे.
अन्य कार्य
- वे जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध जी.एस. कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर रहे और 1996 में सेवानिवृत्त हुए.
- उनके जीवन और कृतित्व पर भारतीय दूरदर्शन और अन्य संस्थाओं द्वारा फिल्में बनी हैं.
संक्षेप में, ज्ञानरंजन एक गहरे चिंतक, कुशल कथाकार और निष्ठावान संपादक थे, जिनकी कहानियाँ मानवीय यथार्थ की पड़ताल करती हैं और ‘पहल’ के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा को पोषित किया.
न्यूज एक्शन परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि।
