विनोद कुमार शुक्ल गये नहीं, हमारे बीच हैं….
- डॉ. सुधीर सक्सेना

विनोद कुमार शुक्ल गये नहीं, हमारे बीच हैं….
• डॉ. सुधीर सक्सेना
ज्ञानपीठ से समादृत कवि-उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। नहीं रहे यानि उनकी भौतिक देह अब हमारे बीच नहीं है। अपनी 90वीं सालगिरह से एक हफ्ता पहले उन्होंने सदा के लिये अपनी आंखें मूंद लीं। पिछले कुछ समय से वह गहन दैहिक पीड़ा में थे; अस्पताल और घर के दरम्यां झूलते हुये। सांसों की डोर अब टूटी तब टूटी की विषम स्थिति थी। उनके पाठकों और शुभचिंतकों का एक बड़ा संसार उनके लिये चिंतित था। उनकी महत्ता और प्रतिष्ठा कि उनकी कुशल क्षेम के लिये अलग-अलग समय पर पीएम, स्पीकर और सीएम ने उनकी मिजाजपुर्सी कर उनकी दीर्घायु की कामना की थी।
विनोद कुमार शुक्ल से मेरी पहली मुलाकात दिसंबर सन 78 में रायपुर में हुई थी। उसके बाद भेंटों का क्रम बना रहा। तब तक उनकी कविता की किताब लगभग जयहिन्द’ आ चुकी थी और उपन्यास’ नौकर की कमीज’ आने को था। उन्होंने मुझसे ‘नौकर की कमीज का प्रुफ जांचने को कहा और हम रिश्तों की अलग डोर में बंध गये। फिर आया खिलेगा तो देखेंगे और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी। इन कृतियों ने उनकी एक अलग छवि सिरजी; एक ऐसी छवि जो अन्य रचनाकारों, खासतौर पर प्रतिष्ठित ‘बड़ों की छवि से भिन्न थी। वह शांत चित्त, संयत और शालीन थे; व्यक्ति और रचनाकार दोनों स्तरों पर। वह कंधे पर कुछ भी नहीं ढोते थे; न दंभ, न आडंबर और न फालतूपन। बड़बोलेपन से वह कोसों दूर थे। ऊंचे-पूरे कद के विनोद जी चलते तो मानो पांवों में रबड़ की स्लीपर पहने हों। कोई कर्कशता नहीं। अपने आप में दुबकी हुई उनकी आकर्षक शख्सियत हंसी उनकी मूंछों में दुबकी रहती और अल्फाज होंठों में। उनकी कविता बटियो के बीच दूब घास में दुबकी हरियाली की मानिंद चुनींदा शब्दों में। वह किसी अन्य कवि या उपन्यासकार की मानिंद न थे। उन्हीं की तर्ज पर कहें तो विनोद कुमार शुक्ल विनोद कुमार शुक्ल की तरह थे। उनके साथ रहो तो किसी और का ख्याल ही नहीं आता। वह पाठक या श्रोता को अपने साथ लेकर अलग छाँव भरी पगडंडी पर निकल जाते थे। उनके साथ चलना औरों को भूलने से अधिक उनका हो जाना था। और वह भी साथ चल रहे साथी से अधिक उसके साथ होने को जानते थे। वक्त के साथ उनकी दुनिया उनके घर के करीब होती गयी थी। वह घर में बरामदे में झूले पर बैठ जाते और सड़क पर आते-जाते लोगों को देखते। सड़क उनके तईं दुनिया को देखने का रंगमंच थी।
विनोद जी का बचपन राजनांदगांव में मुश्किलों में बीता था। उन्हें रायपुर में स्थायी ठौर मिला। लेखन से उन्होंने प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा भी। उन्होंने अपने अनुभव को छत्तीसगढ़ का अनुभव कहा और रचनाओं में उसे विस्तार दिया। उनका परिवार गांधी जी से गहरे प्रभावित था। 30 जनवरी की नृशंस शाम को वह कभी नहीं भूले। उन्होंने गत दिनों कहा था “मेरी आस्था जो है, वह मनुष्ता की तरह है। हिंसा, कट्टरता जैसी चीजें जब किसी धार्मिक आस्था से जुड़ती है; तो वह मुझको अच्छा नहीं लगता।” वह स्थूलता के बजाय सूक्ष्मता, ऊंचाई के बजाय गहराई और माननीय संवेदनों के ऊँचे मयार के रचनाकार थे: अलंकृत होकर भी निरलंकृत। चालीस साल पहले को याद करूं तो वह जब तब मेरी कविताएं सुनने दड़बेनुमा दफ्तर में चले आते थे। विज्ञान कविताओं का मेरा संकलन “सलाम, लुई पाश्चर’ उन्होंने मांगकर पढ़ा। यह नयों में उनके यकीन का परिचायक था। विनोद कुमार शुक्ल जैसी अलीक शख्सियतें जाकर भी नहीं जातीं। वे अपने शब्दों के जरिये हमारे बीच बनी रहती हैं। भौतिक संसार में उनके जाने से जो रिक्तिका बनती है, उसे भरना भला कहां मुमकिन है।

