डॉ. जितेन्द्र शर्मा: द मेड-टेक मैन ऑफ इंडिया@डॉ.सुधीर सक्सेना

डॉ. जितेन्द्र शर्मा
द मेड-टेक मैन ऑफ इंडिया
-डॉ. सुधीर सक्सेना

अक्टूबर के प्रथम सप्ताहारंभ में मुझे एक संदेश मिला। संदेश उस एक शख्स के बारे में था, जिसके बारे में मैंने जानना चाहा था कि प्रथम सप्ताहांत में वह कहाँ होंगे, ताकि मैं उससे मिलने का कार्यक्रम तय कर सकूं। संदेश यूं था : Meeting at WHO, geneva (2nd October) agreement for dialyser line signing at Prague (3rd october) in presence of Hon’ble Union minister Gadkari ji. MR Acess confirmation for factory for MRIs alongside there ongoing research project with us at Newyork (4th October) and final meeting to have World Trade Centre at AMTZ. इसे आप क्या कहेंगे Hectic trip या कुछ और ? किसी भी मान से यह साधारण दौरा नहीं है। फक्त 97 घंटे। 8 शहर | क्रॉसिंग फाइव कंट्रीज | किसी चमत्कार से कम नहीं है यह। मगर यह शख्स है कि ऐसे चमत्कार करता रहता है। अक्टूबर के पहले हफ्ते में उसने ये तकाजे सफलतापूर्वक पूरे किये। छह अक्टूबर को वह वापस दिल्ली में था। वहां से वह वापस अपने मुख्यालय विशाखापटनम के लिए उड़ा। उसके सहयोगियों ने पाया कि वह प्रसन्नवदन है। अम्लान। अक्लांत | अगले सप्ताह के पहले दिन वह दफ्तर में था ; परामर्श, दिशा-निर्देश, और योजनाओं का खाका बनाने में मशगुल……. |
कौन है यह शख्स ? यह शख्स कोई अजूबा या एलियन नहीं है, बल्कि हमारे-आप जैसा साधारण नाक-नक्श का व्यक्ति है। ऊंचे पूरे कद के आजानु बाहु प्रतीत होते इस श्यामल-बरन स्फूर्त व्यक्ति का नाम है डॉ. जितेंद्र शर्मा। बिना किसी शोरशराबे या प्रचार-प्रसार के उसने दक्षिण भारत के तटीय नगर विशाखापटनम में बंजर में अनूठा फूल खिला दिया है, जिसे दुनिया एएमटीजेड के नाम से जानती है। हेल्थ केयर का यह अनू‌ठा फूल विश्व का विशालतम मेड-टेक पार्क है। कोविड के विषम काल में इस उपक्रम के साकार होने से भारत हेल्थ-केयर में सुनहरी ऊँची पायदान पर खड़ा हो गया है। इस परिसर में दुनिया की चुनिंदा और अव्वल करीब सवा सौ कंपनियाँ कार्यरत हैं। एएमटीजेड बहुत कम समय में शोध, अनुसंधान, उत्पादन, घरेलू आपूर्ति और निर्यात का ठीहा बनकर उभरा है। एएमटीजेड कीर्तिमान समय में कीर्तिमान उपलब्धियों का पर्याय है। निरंतर स्पंदित और निरंतर गतिशील। मेधावी शोधार्थी, वैज्ञानिक और चिकित्सक उससे जुड़ रहे हैं। नये-नये एमओयू यानि अनुबंध-पत्रों का सिलसिला जारी है। डॉ. शर्मा का एक पाँव देश में रहता है और दूसरा विदेश में। कुछ ही साल बीते हैं कि एनआरआई, सीटी स्कैनर्स, ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर में हम परावलंबी थे | मेड-टेक हमारी कमजोर कड़ी था। आयात पर निर्भरता और हजारों करोड़ रुपयों का आयात-बिल। डॉ. शर्मा ने अपने अदम्य संकल्प, अवधारणा, सामूहिक श्रम और मेधा से अनहोनी को होनी में बदल दिया। आयात के भीतर खुलते कपाट निर्यात के बाहर खुलते कपाटों में परिवर्तित हो गये। हेल्थ- केयर से जुड़ी यह गाथा डॉ. स्वामीनाथन की हरित क्रांति अथवा डॉ. कुरियन की श्वेत-क्रांति के समकक्ष है। डॉ. शर्मा की कृति ‘मेड इन लॉकडाउन’ को पढ़ें, तभी आप भारत में मेड-टेक क्रांति की उस गौरव-गाथा को बूझ सकेंगे, जिसमें विचार- कण और स्वेद परस्पर गुंथे हुए हैं। यह गाथा अभी अधूरी है, क्योंकि वहां आकल्पन, द्रुत गति से विस्तार और स्वप्नों की तामीर थमी नहीं है। मेडिकल तकनालाजी में जो कुछ अद्यतन है, वह यहां विद्यमान है। यही नहीं, जो कुछ अद्यतन है, उसमें नये योग का समवेत यत्न जारी है।
डॉ. जितेन्द्र शर्मा भारत में मेड-टेक क्रांति के पुरोधा हैं। वह अत्यंत विनम्र हैं। उनकी यह विनम्रता सहज है। कृत्रिम नहीं, वरन स्वाभाविक। वह संस्थान के बारे में बोलते हैं। अपने साथियों के बारे में बोलते हैं। अपने स्वप्नों के बारे में बोलते हैं, लेकिन अपने बारे में नहीं बोलते। दुनिया के आला मेड-टेक पार्क के बारे में वह घंटों बोल सकते हैं, लेकिन अपने बारे में बोलने में संकोच उन्हें घेर लेता है। डॉ. शर्मा सही अर्थों में वैश्विक सोच की पैन-इंडियन शख़्सियत हैं। राजस्थान में कोटा में जनमे। पश्चिम बंगाल में पले-बढ़े और पढ़े।
उच्चतर अध्ययन पुट्टपर्थी में हुआ। वह दिल्ली में भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में कार्यरत रहे। उनका जीवन उन्हीं के शब्दों में सुनिये। वह बताते हैं – “मेरा आरंभिक जीवन बड़ा सरल रहा है। मैं रेलवे स्कूल का पढ़ा हुआ हूँ। मैं अपने घर में रेलवे स्टेशन से, जो कोई डेढ़ या दो किमी था, पानी लाता था। हमारे घर में पीने का पानी नहीं था। बहुत छोटा घर था और बहुत सारे सदस्य। मुझे छात्र‌वृत्ति मिली थी। मैं श्री सत्यसाईं इंस्टीट्यूट ऑफ़ हायर लर्निंग का छात्र रहा हूँ। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मुझे प्रशिक्षण मिला है और हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ से यूनिवर्सिटी ऑफ अडेलिड तक, उप्पसला मोइटोरिंग सेंटर, स्वीडन से विरहे यूनीवर्सिटी, एम्स्टर्डम तक, पीएमडीए जापान से लेकर जॉन हॉप्किंस सेंटर, यूएसए तक मेरी सारी ट्रेनिंग छात्रवृत्ति पर हुई है। बचपन में मैं साइकल पर साबुन, च्यवनप्राश, बिस्कुट आदि बेचा करता था और अब चिकित्सा उपकरणों और अस्पताल प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करता हूँ। यह मेरा सौभाग्य है।”
डॉ. शर्मा में अधीरता नहीं है, किंतु उनमें गज़ब की तत्परता है। यह तत्परता उन्हें ‘देहरी- आवृत्ति’ से संपृक्त करती है। फकत 342 दिनों के रिकार्ड समय में उन्होंने अपरिचित क्षेत्र में इतना बड़ा वैज्ञानिक ढांचा खड़ा कर दिया है कि कोई भी दांतो तले अंगुली दबा ले। भारत में अस्पताल-प्रशासन के पितामह डॉ. एएन सफाया उनके शिक्षक व गुरु थे। उनके मंत्र डॉ. जितेन्द्र के बड़े काम आये। डॉ. शक्ति गुप्ता और डॉ. सचिन मंडल की चिकित्सा उपकरणों और सामाजिक स्वास्थ्य की दीक्षा उनके बड़ा काम आई। आज सिटी ऑफ डेस्टिनी (विशाखापटनम) में लगभग 1.2 मिलियन वर्गफुट भूखंड में, जहां न पहुँच मार्ग था, न पाइपलाइन या रेडियो सिग्नल, न ही बिजली के खंभे और तार, न कोई झोपड़े-टपरे, और तो और जिसका कोई पिनकोड भी नहीं था, नयनाभिराम, आधुनिक, सर्वसुविधायुक्त आकर्षक परिसर उभर आया है। विश्व की नामचीन फार्मास्यूटिकल कंपनियों का वह प्रिय गंतव्य है। एएमटीजेड के चार हरूफ ने मेडिकल टेक्नालॉजी की सारी वर्णमाला अपने आगोश में समेट ली है। इसकी अधोसंरचना और निर्मिति में दो बेमेल प्रतिदर्शों- होमी जे. भाभा के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और डॉ. वर्गीज कुरियन के अमूल का मणिकांचन योग है। संकुल का शिलान्यास 19 अगस्त, 2016 को हुआ। सन 2017 में योजना बनी। सन 2018 में इसने मूर्तरूप लिया और सन 2019 में यह विश्व-सेवा के लिए उद्घाटित हुआ। यह अविश्वसनीय प्रतीत होता सच है कि डॉ. कलाम कन्वेंशन सेंटर ने मात्र 78 दिनों की छोटी-सी अवधि में आकार ग्रहण किया और वहां वर्ल्ड हेल्थ फोरम का अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। डॉ. शर्मा के गतिशील और प्रेरक नेतृत्व ने सहयोगियों में गजब की गतिज ऊर्जा का संचार किया है। आज एएमटीजेड विश्व में एकमात्र ऐसा क्लस्टर है, जहां मास्क से लेकर एमआरआई मशीन तक, आरटीपीसीआर किट से लेकर एलिसा किट तक, थर्मामीटर से लेकर वेंटिलेटर तक और मरीजों के बिस्तर से लेकर सीटी स्कैन मशीन तक बनती है। भारत कोविड की महामारी से बखूबी जूझ सका तो उसका श्रेय बड़ी हद तक एएमटीजेड को जाता है।
विशाखापटनम का मेड-टेक सिटी, जिसे 342 दिनों में गढ़ा गया, आज भारत के गौरव का प्रतीक है। एएमटीजेड चिकित्सा सुविधाओं में स्वावलंबन के अभीष्ट की ओर उठा सार्थक कदम है; आत्मविश्वास से भरपूर डग। वहाँ नीले आसमान के वितान तले भारत के गौरव का निशान 10×8 मीटर का राष्ट्रध्वज जिस ध्वजदण्ड पर लहराता है, उसकी ऊंचाई है 108 फुट और वजन है 17 टन | विश्व में क्लीनिक- इंजीनियरिंग के पुरोधा टॉम मूड यूँ ही इस मेड टेक मैन पर निसार नहीं हैं। ….. और मेड टेक मैन डॉ. जितेंद्र शर्मा ? उनके जीवन का मंत्र है चरैवेति, चरैवेति। श्रम में ही उनका अवकाश निहित है। क्या आप यकीन करेंगे कि इस 43 वर्षीय ऊर्जावान शख्सियत के ऑफिस में कोई घड़ी नहीं है। यदि होती भी तो यकीन मानिये कि यह शख्स घड़ी की सुइयों को भी मोड़ने की ताब रखता है।

“उसके दफ्तर में घड़ी नहीं”

डॉ. जितेन्द्र शर्मा के लिये

वह अलबेला मुसाफिर
बीच सफर में है अविराम

सफर शुरू हुआ था उसका हाड़ौती से
जो कभी कोट में बसा था,अलबत्ता अब कोट छोटा उसके वास्ते
बेतरह-बेतरह नदी के इर्द-गिर्द उसका विस्तार
अपार

मगर, कोटा छूटा
छूटा चितरंजन धूप के ताये सफर में
ज्ञात था उसे, याद रहा हर सू
कि मीलों-मील चलना है
रूके नहीं उसके पांव
चलता रथ वह पुट्टपर्ती में उसे मिली ठाँव
छूटा वह,छूटी फिर दिल्ली भी
जिंदगी के वक्फ़े पर लिखा था शहर और
दक्खिन में सागर-तीरे मिला उसे ठौर

बीहड़ में
जहां न बस्ती थी, न पगडंडी, न रोड
न चांपाकल, न बिजली का खंबा, न पिन-कोड

वहां फूल खिला
ईंट-गारे में, सीमेंट में, इस्पात में,
रचते हुए कीर्तिमानों पर कीर्तिमान
कलाम ऑडीटोरियम उनमें अव्वल अभिराम

पीठ थपथपाता रहा वह अपनी टीम की
अहर्निश बढ़ाता रहा हौसला
कभी नहीं बजाये गाल
एपीजे ने कहा था – ‘ड्रीम…. ड्रीम…. ड्रीम…..।’
उसने ख्वाब देखा
मेड टेक सिटी का सपना
ख्वाब कि हेल्थ केयर में अग्रणी हो देश अपना।

इसमें आशा का पारावार
आत्मविश्वास अपार
कहें तो आशा की धृष्टता या आशा का दुस्साहस
उसके साहस, ऊर्जा, दूरदर्शिता पर
टॉम जूड ही नहीं,
विस्मय-विमुध सारा संसार

वह पुरजोखिम कामों का बीड़ा उठाने में माहिर
अठ्हत्तर दिनों में कन्वेंशन सेंटर का निर्माण,
आपदा में हर लम्हा अवसर की तलाश
पौने तीन सौ एकड़ में बिखरे कितने ही प्रमाण।

22 फरवरी, सन 2016 का दिन था वह
दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे के
टर्मिनल से उड़ान
गंतव्य था वाइज़ाग,
जेहन में ‘फील्ड ऑफ ड्रीम्स’ की सतर
‘इफ यू बिल्ड इट, दे विल कम
मेड टेक से अनूठा था इस विज्ञान-शिल्पी का राग

यह जिद थी कि संकल्प
कि पांई उसने
डब्लूएचओ के चौथे ग्लोबल-फोरम की मेज़बानी

खोला दुनिया का पहला मेड इन इंडिया अस्पताल,
इंडिया एक्सपो सिटी यानि पहला मेडटेक प्रदर्शनी केंद्र
और अब चिकित्सा-प्रौद्योगिकी के
पहले वैश्विक विश्वविद्यालय का निर्माण
सचमुच अनूठी है लासानी मेड इन लॉकडाउन की दास्तान

पर्श्व में तैरती है स्वर-लहरी
‘इफ यू बिल्ड इटए दे विल कम
यकीनन, वे आये, आ रहे हैं और आते रहेंगे अबाध
‘मेड इन लॉकडाउन है ज़रखेज खजानों के द्वारों पर आघात

इसे कहें एएमटीजेड
याकि शताधिक पंखुरियों में पुष्प धवल
है दिग-दिगंत में व्याप रहा जिसका परिमल

गौर करो!
गौर करो तो पाओगे
कि उसके कमरे में कोई घड़ी नहीं,

न दीवार पर न मेज पर
डॉ. जितेन्द्र शर्मा
यानि शख्स, जो खयालों और ख्वाबों से
बेतरह बहबूद
समय से होड़ लेने की
हिम्मत और हिकमत के बावजूद
उसके दफ्तर में नहीं कहीं भी घड़ी का व़जूद।
………..

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