उर्जाधानी की धरा पर फिर गूजेंगी खदानों की गड़गड़ाहटः कमर्शियल कोल माइनिंग, 14वें चरण की कोयला खदान नीलामी प्रक्रिया में छत्तीसगढ़ की 15 खदानें शामिल ,कोरबा के 5 ब्लॉक पर दोबारा शुरू हुई बोली प्रक्रिया

कोरबा 04 नवम्बर। ऊर्जाधानी कोरबा एक बार फिर देश के कोयला मानचित्र पर सुर्खियों में आ गया है। केंद्र सरकार ने कमर्शियल कोल माइनिंग के तहत 14वें चरण की कोयला खदान नीलामी प्रक्रिया का शुभारंभ कर दिया है। इस दौर में कुल 7 राज्यों की 41 खदानें शामिल की गई हैं, जिनमें छत्तीसगढ़ की 15 खदानें प्रमुख हैं। इनमें से कोरबा जिले की 5 कोयला खदानें- तौलीपाली, बताती-कोल्गा वेस्ट, मदवानी, करतला साउथ और कलगामार कृ सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। इन ब्लॉकों में कुल 12,725 मिलियन टन से अधिक कोयले का विशाल भंडार मौजूद है।

नीलामी प्रक्रिया की शुरुआत केंद्रीय कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की। बताया जा रहा है कि कोरबा और करतला विकासखंड के अंतर्गत आने वाले इन ब्लॉकों की नीलामी इससे पहले भी की गई थी, लेकिन स्थानीय विरोध के चलते निवेशकों ने कदम पीछे खींच लिए थे। अब इन खदानों को दोबारा नीलामी के लिए सूचीबद्ध किया गया है, और मंत्रालय को उम्मीद है कि इस बार निवेशक आगे आएंगे।

कोरबा जिले की सभी प्रस्तावित खदानें घने वन क्षेत्र से घिरी हुई हैं। यह इलाका न केवल कोरबा की प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र है बल्कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। इन वनों को औद्योगिक प्रदूषण के बीच “कोरबा के फेफड़े” कहा जाता है, जो शहर की स्वच्छ वायु और जल स्रोतों के लिए अनिवार्य हैं।

मांड-रायगढ़ कोलफील्ड्स में स्थित हैं सभी ब्लॉक
नीलामी के लिए चयनित ये सभी पांच ब्लॉक मांड रायगढ़ कोलफील्ड्स क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इनमें से तौलीपाली, करतला साउथ और बताती-कोल्गा वेस्ट पूरी तरह कोरबा जिले में हैं, जबकि मदवानी और कलगामार ब्लॉक कोरबा और रायगढ़ की सीमाओं पर फैले हैं।
खदानों का विस्तृत विवरण
कोल ब्लॉक-क्षेत्रफल (वर्ग किमी)-
कोयला भंडार (मिलियन टन)
तौलीपाली- 42.50-4320
बताती-कोल्गा वेस्ट
39.37-1145.86
मदवानी-53.81-2750
करतला साउथ-36.40-1160
कलगामार-53.81-3350
कुल अनुमानित भंडार-
12,725 मिलियन टन से अधिक
हाथियों का गलियारा और पर्यावरणीय चुनौती

इन सभी ब्लॉकों का क्षेत्र हाथियों के प्राकृतिक गलियारे के रूप में जाना जाता है। यहां से हाथियों के झुंड नियमित रूप से कोरबा से धरमजयगढ़ तक आवाजाही करते हैं। साथ ही यह क्षेत्र किंग कोबरा, भालू, सियार, हिरण और अन्य दुर्लभ प्रजातियों का निवास स्थान भी है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि यहां खदानें शुरू की गईं, तो न केवल वन्य जीवों के जीवन चक्र पर असर पड़ेगा बल्कि जंगलों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।

स्थानीय विरोध और जनभावनाएं
पिछली नीलामी के दौरान करतला कोल ब्लॉक को लेकर स्थानीय ग्रामीणों ने तीव्र विरोध दर्ज कराया था। उनका कहना है कि नई खदानें खुलने से उनकी खेती योग्य भूमि, जल स्रोत और आजीविका पर गहरा असर पड़ेगा। इस बार सरकार ने स्पष्ट किया है कि नीलामी प्रक्रिया में स्थानीय सहमति, पर्यावरण मूल्यांकन और सामाजिक जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।
कोरबा के पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय जनप्रतिनिधि इस बात पर एकमत हैं कि विकास आवश्यक है, परंतु यह पर्यावरण और जनहित के संतुलन के साथ होना चाहिए। अब देखने वाली बात यह होगी कि कोरबा की धरती पर ऊर्जा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच यह नई नीलामी कैसी दिशा तय करती है।

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