किताब के बहाने
‘कविता का क्षितिज’ : समकाल की छटा
• डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. नीरज दइया समर्थ साहित्यकार हैं। अनेक विधाओं में पारंगत नीरज आलोचक हैं, अनुवादक हैं और संपदक भी। वह साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर और राजधानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से सम्मानित हैं। उनकी सोच और रचनाओं का फलक व्यापक है और उकने लेखन में नैरन्तर्य है। इधर न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से उनकी तीन किताबें एक साथ आई हैं : बाल कथा साहित्य की ‘इंद्रधनुषी सफर’, स्वातंत्र्योत्तर राजस्थानी साहित्य डॉ. अर्जुनदेव चारण की राजस्थानी कविताओं के हिन्दी अनुवाद की कृति ‘अगन सिनान’ और आलोचना की ‘कविता का क्षितिज’।
कविता से नीरज का दूर का या पाठकीय रिश्ता नहीं है। वह स्वयं कवि हैं। कविता के मर्म को बूझते हैं और उन्होंने हिन्दी और राजस्थानी में परस्पर अनुवाद भी किया है। यह काम उन्होंने बहुत यत्नपूर्वक, गंभीरता और गहरी तल्लीनता से किया हे। इन सबके फलस्वरूप उन्होंने प्रसिद्धि, पहचान और प्रतिष्ठा अर्जित की है। उनकी 142 पेजी किताब ‘कविता का क्षितिज’, जिसका आवरण प्रसिद्ध चित्रकार कुँवर रवीन्द्र ने बनाया है, को इन्हीं सन्दर्भों में देखा और आंका जाना चाहिये।

कविता का क्षितिज’ में नीरज ने हिन्दी कविता के समकाल पर बात की है। यह बात उन्होंने 26 कवियों के बहनाने की है। आलोच्य-कृति में जहां आईदानसिंह भाटी, रति सक्सेना, कुँवर रवीन्द्र, फारूक आफरीदी, नवनीत पांडेय, मंगत बादल और सुभाष राय जैसे जाने-पहचाने परिचित कवि हैं, वहीं सपना भट्ट, ऋतु त्यागी, साधना प्रधान, नीलम पारीक, रजनी छाबड़ा, वत्सला पांडेय जैसी कवयित्रियां भी हैं। फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। उसमें ज्योति कृष्ण वर्मा, कुमार विजय गुप्त, बृजेन्द्र अग्निहोत्री, कुमार अजय जैसे नये नाम हैं, तो अनुवादक कवि संतोष अलेक्स, व्यंग्य-कवि लालित्य ललित, डॉ. संजीव कुमार, शंकरानंद, राजेन्द्र जोशी, मदनगोपाल लढ़ा, सत्यनारायण भी परिधि में समाहित हैं।
‘कविता का क्षितिज’ की शुरूआत नीरज ने दिलचस्प तौर पर मुझसे की है। शायद वरिष्ठता के नाते अथवा सम्मान-मिश्रित अनुरागवश। नीरज ने मुझ पर पहले भी लिखा है और मेरी कविताओं का हिन्दी से राजस्थानी में अनुवाद, जिसे वह अनुसृजन कहते हैं, भी किया है। लेख का उन्होंने शीर्षक दिया है : ‘अनिर्मित काव्य-पंथ के पंथी।’ इसमें उन्होंने मेरी करीब पांच दशकों में फैली कविता यात्रा को समेटने की कोशिश की है। मेरी कविताओं की विशद पड़ताल को शेष बताते हुये वह मानते हैं कि मेरी कविता लीक छोडकर चली है और वह असहजता को सहजता से स्वीकार करते हुये अपने विशिष्ट विन्यास में सामान्य से अलग हैं। उन्होंने मुझे कविता प्रांगण का अलबेला पंथी बताया है। एक समर्थ कवि-आलोचक अनुवादक का यह ‘फीडबैक’ मेरे लिये मायने रखता है।
कविता और अनुवाद के साझा शिविर की बात करें तो इसमें रति सक्सेना, संतोष अलेक्स, रजनी छाबड़ा की कविताओं पर बात की है। रति का पहला संकलन सन 1999 में आया था और उन्होंने अनेक विधाओं में कलम चलाई है। उनकी भाषा में ‘पोएटिक एलीमेंट’ है। उनके लिए चांद उदयपुर की झील में कांसे की थाली सा तैरता खूबसूरत बिंब है। उनके तई हँसी एक प्रार्थना है। उनकी कविता का एक मिजाज यह भी कि उन्हें शहर एक गदबदे खरगोश सा नज़र आता है। यह सही है कि उनकी रचनात्मकता का विशद मूल्यांकन नहीं हुआ है।

सुभाष राय हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि है। वह अच्छे अनुवादक भी हैं। ‘बहुत कुछ होने की संभावना में’ नीरज ने उनकी कविताओं की सार्थक पड़ताल की है। अक्क महादेवी पर किये काम से चर्चित सुभाष की कविता ‘ईश्वर’ बेहतरीन कविता है। उनकी कविता की एक बानगी कि आग नहीं होती। तो स्वप्न नहीं होते। स्वप्न नहीं होते तो प्रेम नहीं होता।’ कवि के तईं आग की तरह जन्म लेता है प्रेम। नीरज ‘साठ पार’ के कवि सत्यनारायण को प्रेमाश्रयी अथवा सूफी काव्यधारा का विस्तार अथव नव-संस्करण मानते हैं। नीरज के ही जरिये हम दाझे पाँवोवेल कवि आईदान से परिचित होते हैं और मंगत बादल से भी। शब्दों, रंगों और रेखाओं में यकसां दखल रखने वाले कुँवर रवीन्द्र के बारे में विस्तार से बात करते हुए नीरज ने उनकी अनगढ़ता में गढ़ने के शिल्प और प्रौढ़ता को रेखांकित किया है। इस कवि के मिजाज को भांप इससे बूझ सकते हैं : मैं लाल, नीला, केसरिया या हरा। नहीं होना चाहता। मैं इंद्रधनुष होना चाहता हूँ। धरती के इस छोर से उस छोर तक फैला हुआ।
इसके आगे नीरज ने अपने गृहनगर के कवि नवनीत पांडेय की कविताओं पर बड़े मनोयोग से लिखा है। नवनीत चुप्पी को धोखा या छल मानते हैं और निर्भीक अभिव्यक्ति के हिमायती हैं। निरंजन श्रोत्रिय कहते हैं कि नवनीत राजनीतिक दुरभिसंधियों को उघाड़ते हैं, तो सुमन केशरी मानती हैं कि नवनीत की स्त्रियों को समर्पित कविताएं स्त्री के लिए समाज-प्रदत्त कर्तव्यों को अंतिम सत्य मानने से इंकार करती कविताएं हैं। नीरज ने वरिष्ठ कवि शहंशाह आलम की अर्जित भाषा की तारीफ की है ओर उनसे कल और बेहतर कविताओं की आश्वस्ति दर्शायी है। बकौल नीरज वत्सला की कविताएं व्याकुल स्त्री मन की कविताएं हैं ओर वे अनुभूति को सघन से सघन तक करते हुए काफी हद तक परस्पर एक दूसरे से जुड़ती हैं। ऋतु त्यागी के सद्य प्रकाशित संग्रह ‘तितलियों के शहर में’ की समीक्षा गहरी तल्लीनता की मांग करती है। ऋतु की कविताएं काव्यालोचन के लिए चुनौती प्रस्तुत करती हैं। ‘कविता हमें भीतर से मुलायम करती हैं’ को आप क्या कहेंगे : बयान, उदघोषणा, परिभाषा या दृष्टिकोण” यह मुलायमियत ही है कि वह गणित की जगह कविता को चुनती हैं। दीर्घ के बजाय लघु पर अटकना कवयित्री ऋतु की सामथर्य दर्शाता है। इसी तरह मदनगोपाल लढ़ा के ‘सुनो घगघर’ की कविताएं स्थानीयता के रंगों से सजी हैं। उनमें सरलता, सहजता और सादगी है। अपने प्रथम कविता संकलन ‘शब्द कभी बांझ नहीं होते’ में फारूक आफरीदी का कविमन अभिव्यक्ति का वि तान रचता है, तो शंकरानंद कविता में सरल-सहज रहते हुये द्युति उत्पन्न करते हैं। संजीव कुमार ‘तिष्यरक्षिता’ में इतिहास के धूसर पृष्ठ का सुंदर काव्यात्मक रूपांतरण करते हैं, तो लालित्य की कवितायें जीवन के सौंदर्य की अभिव्यंजनायें हैं। कवि-अनुवादक संतोष अलेक्स से हम सब परिचित है। सन 2020 में आई ‘पिता मेरे’ उनकी लंबी कविता है। इसमें कवि ने पिता के अद्वितीय एहसास को सहेजने का काव्यात्मक उपक्रम किया हे। कवि की पंक्तियों ‘मेरे लिए/ दो पैरों पर चलते/ईश्वर का नाम है पिता की अनुगूंज जेहन में देर तलक बनी रहती है।

डॉ. सुधीर सक्सेना

‘लौटा हुआ लिफाफा’ में कुमार विजय गुप्त की विविधवर्णी कविताएं हैं। कुमार में हुनर है और वे साधारण और मामूली चीजों को असाधारण और जरूरी चीजों के रूप में प्रस्तुत करने की कुब्बत रखते हैं। रजनी छाबड़ा की कविताओं को नीरज ने भावों और अभावों के संवेदनात्मक शब्दचित्रों की संज्ञा दी है। ज्योति कृष्ण की छुईमुई कविताओं में जीवन का विराट सच प्रतिबिंबित हैं। कहाँ है मेरा आकाश’ के बाद अपने आकाश को खोज लेने में कामयाब रही हैं। साधना प्रधान की प्रथम कविता संकलन ‘सद्योजात’ उनकी काव्य प्रतिभा को स्थापित करते हुये भविष्य में बेहतर कविताओं की संभावना जताता है।
‘कविता का क्षितिज’ में एक छह पेजी लेख है : मनुष्य की संज्ञा और श्रेणी से बेदखल। यह लेख कवयित्री सपना भट्ट के नवीनतम संकलन ‘भाषा में नहीं’ पर है। लेख तवज्जो चाहता है। वजह कि सपना की कविताएं विरोधाभास में लिथड़े भारतीय समाज की सच्चाई को उजागर करती हैं। कवयित्री स्त्रीत्व के रंग की बात करती है। अंतर्कथाओं को समेटती उसकी कवितायें स्त्री के भीतरी-बाहरी संघर्षों का दस्तावेज हैं। स्त्रियों से हमारे समाज की अपेक्षायें क्या हैं : ‘इतने सलीके से ओढ़े दुपट्टे /कि छाती ढंकी रही/ पर मंगलसूत्र दीखता रहे/चेहरे पर हो इतना मेकअप / कि तिल तो दिखे ठोढ़ी पर का / पर रात पड़े थप्पड़ का /सियाह दाग छिप जाये।’ यह कविता मुझे बरबस ओड़ियां कवयित्री सुवाश्री लेंका की कविता की याद दिलाती हैं। बहरहाल, सपना की कविताओं में राग-विराग के मोहक शेड्स हैं और आस्वाद भी। उनकी कुछ कविताएं प्रिय कवियों के लिये भी हैं, जो नीरज को मेरी ‘किताबें’ दीवार नहीं होती’ की मित्रों के लिये लिखी कविताओं की याद दिलाती हैं।

डॉ. नीरज दइया को साधुवाद। कवियों के चयन में उनका औदार्य प्रशंसनीय है। कृति झरोखा खोलती है कि हम समकाल की कविता के एक और चमकीले टुकड़े को देख सकें। वह हमें कई परिचित-अपरिचित हस्ताक्षरों से परिचित कराती है और उनके संकलनों को पढ़ने की जिज्ञासा जगाती है, जहां समकाल की छटा बिखरी हुई है।

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