जल रहा है नेपाल, ढह गई सत्ता की मीनार; क्यों बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे बन गए हालात..?

काठमांडू। नेपाल की राजधानी काठमांडू इस वक्त आक्रोश की चपेट में है। सोशल मीडिया पर सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने युवाओं के गुस्से को इतना भड़का दिया कि हिंसक प्रदर्शनों में पूरा देश जल रहा है। यह घटना पिछले साल बांग्लादेश और 2022 में श्रीलंका में हुए बड़े आंदोलनों की याद दिलाती है, जहां युवाओं ने सरकारों को हिलाकर रख दिया था। सवाल यह है कि – क्या नेपाल में भी इतिहास खुद को दोहराएगा?

युवाओं का गुस्सा, एक जैसी कहानी

नेपाल में बीते हफ्ते 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जिनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे चर्चित ऐप्स शामिल हैं, पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। युवाओं ने इसे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला माना। दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं कि नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के आंदोलनों की वजहें भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उनमें एक समानता हैः सरकारी नीतियाँ लोगों की अपेक्षाओं से मेल नहीं खा रही हैं।

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी के मुताबिक, “दक्षिण एशिया का यह इलाका युवाओं से भरा है और सरकारें इन युवाओं की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पा रही हैं।” नेपाल में 15 से 24 साल के युवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है, लेकिन उनके पास रोजगार के अवसर बहुत कम हैं। ऐसे में, सोशल मीडिया पर लगा प्रतिबंध उनके लिए एक चिंगारी बन गया, जिसने वर्षों से जमा हो रहे आक्रोश को भड़का दिया।

बांग्लादेश और श्रीलंका: जब युवाओं ने सरकारें गिरा दीं

नेपाल की तरह श्रीलंका (2022) और बांग्लादेश (2024) में भी जेन जी ने बदलाव का झंडा बुलंद किया था। जेन जी 1997 और 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी को दिया गया शब्द है। इंटरनेट और सोशल मीडिया सहित आधुनिक तकनीक के साए तले पली बढ़ी ये पहली पीढ़ी है। बीते वर्ष अगस्त 2024 में, सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही देशव्यापी विरोध में बदल गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने की कोशिश की, लेकिन इससे युवाओं का गुस्सा और भड़क गया। हिंसा में सैकड़ों लोगों की मौत हुई। आखिरकार, जनता के दबाव में आकर शेख हसीना को अपना पद और देश दोनों छोड़ना पड़ा, जिससे उनका 15 साल का लंबा शासनकाल समाप्त हो गया।

इससे पहले, 2022 में श्रीलंका में भी ऐसा ही हुआ था। देश की बदहाल अर्थव्यवस्था और महंगाई से परेशान जनता ने राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया, जिसे ‘अरागलाया’ या जन संघर्ष कहा गया। यह आंदोलन तब अपने चरम पर पहुँचा, जब प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया। इस घटना के बाद, गोटबाया राजपक्षे को देश छोड़कर भागना पड़ा और उन्होंने सिंगापुर से अपना इस्तीफा भेजा।

नेपाल की त्रासदी 20 मौतें और सियासी अस्थिरता

सोमवार को काठमांडू में हुए हिंसक प्रदर्शनों में कम से कम 17 लोगों की मौत हुई, जबकि पूरे देश में यह आँकड़ा 20 तक पहुँच गया। प्रदर्शनकारी संसद भवन में घुसने की कोशिश कर रहे थे, जिसके बाद पुलिस ने उन पर सख्ती से कार्रवाई की। नेपाल में दशकों से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के मामलों ने भी इस आंदोलन में आग में घी डालने का काम किया है। राजशाही खत्म होने के बाद कोई भी सरकार अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। इस अस्थिरता ने युवाओं में सरकार के प्रति अविश्वास को बढ़ाया है, और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ने इस अविश्वास को विस्फोट में बदल दिया है।

नेपाल के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने भी माना है कि, इस आंदोलन में अराजक तत्व घुस आए हैं, जिन्होंने हिंसा भड़काई। वहीं, पूर्व डीआईजी हेमंत मल्ला का कहना है कि सरकार की खुफिया एजेंसी स्थिति का सही आकलन करने में नाकाम रही, जिसके कारण जानमाल का इतना नुकसान हुआ।

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का मानना है कि, नेपाल में फिलहाल कोई बड़ा नेता या संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहा है। लेकिन अगर सरकार ने युवाओं के आक्रोश को शांत करने की कोशिश नहीं की, तो यह आंदोलन और भी बड़ा हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि, नेपाल की सरकार इन दो पड़ोसी देशों से क्या सबक लेती है और क्या वह युवाओं की आवाज को अनसुना कर सकती है.?

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