खदानों में बेहतर काम होने के दावे, हड़ताल के बाद एसईसीएल और ट्रेड यूनियन कर रहे आंकलन

कोरबा 10 जुलाई। श्रम कानून की विसंगतियों, आउट सोर्सिंग को बढ़ावा देने सहित कई मुद्दों को लेकर ट्रेड युनियनों ने बुधवार को एक दिन की देश व्यापी हड़ताल की। कोरबा जिले में कुछ युनियन समर्थन में रही तो कुछ बाहर। खासतौर पर औद्योगिक क्षेत्र में कोल इंडिया को छोड़ पावर सेक्टर हड़ताल से अछूता रहा। वहीं एसईसीएल की खदानों में बेहतर काम होने के दावे किये जा रहे हैं। अब हड़ताल के बाद एसईसीएल और ट्रेड युनियन इस बात का आंकलन करने लगे है कि कि से क्या नुकसान हुआ और क्या फायदा।

एसईसीएल की ओर से यह बताने का प्रयास किया गया है कि उसने हड़ताल दिवस को भी कोरबा सहित कंपनी के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित अपनी खदानों में ना केवल व्यापक उत्पादन किया बल्कि एक दिन पहले के मुकाबले हड़ताल दिवस को इसका ग्राफ बढ़ा। उपस्थिति भी काफी अच्छी रही। हालांकि इस बात को भी स्वीकार किया कि शुरूआती शिफ्ट में उपस्थिति में कुछ असर रहा। लेकिन ओव्हरआल देखा जाए तो कर्मियों ने अपने आपको उत्पादन व अन्य गतिविधियों में बनाए रखा। कंपनी का दावा है कि तमाम प्रयासों के बावजूद हम अपने कामकाज के मामले में आगे रहे और हड़ताल का असर नहीं रहा।

दूसरी ओर इस हड़ताल में पहले से ही बीएमएस समर्थित कोयला खदान मजदूर संगठन बाहर था। उसने कहा था कि राजनीतिक कारणों से हड़ताल हो रही है इसलिए इसका कोई औचित्य नहीं है। बीएमएस को छोड़ बाकी युनियन हड़ताल में शामिल रही और अपने स्तर पर सफलता के लिए प्रयास किया। जिस तरह से कोरबा सहित आसपास के जिलों में हड़ताल दिवस को कामगारों की उपस्थिति का ब्यौरा उजागर हुआ है, उसने हड़ताल की सफलता पर प्रश्रचिन्ह लगा दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस हड़ताल से नुकसान कंपनी को हुआ या फिर युनियनों को। युनियने सोच में पड़ी है कि ज्यादा उत्पादन होने का मतलब बहुत कुछ है। ऐसा आखिर कैसे हुआ। कहा जा रहा है कि हड़ताल में उपस्थिति का प्रतिशत ज्यादा होना और इसके पीछे के वास्तविक कारणों की समीक्षा युनियन के बड़े पदाधिकारी जल्द ही करेंगे। संभव है कि इस आधार पर औद्योगिक जिले कोरबा समेत अन्य क्षेत्रों में यूनियनों को अपनी सदस्य संख्या के हिसाब से वर्चस्व दिखाने के लिए कुछ करना पड़ सकता है।

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