अमेरिका: पार्टी के गठन के बावजूद चुनाव नहीं लड़ सकेंगे एलन मस्क

• डॉ. सुधीर सक्सेना
स्पेस एक्स और टेस्ला के स्वामी एलन मस्क विश्व के अत्यंत धनाढ्य नवकुबेर हैं। वह महत्वाकांक्षी भी हैं और उन्होंने कई ऊंचे मंसूबे बाँध रखे हैं। किस्सा कोताह यह कि वह तिजारत और सियासत एक साथ करना चाहते हैं। अमेरिका पार्टी का गठन उनकी इस सोच की परिणति है, अलबत्ता उनके इस अप्रत्याशित कदम ने यकबयक अनेक प्रश्न खड़े कर दिये हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और धनाढ्यतम एलन मस्क के मध्य रोमांस का दौर लंबा चला। यह सर्वमान्य धारणा है कि बिना मस्क के सक्रिय सहयोग के ट्रंप राष्ट्रपति की कुर्सी तक दोबारा नहीं पहुंच सकते थे। खुले समर्थन के अलावा मस्क ने ट्रंप की जीत के लिये करीब 250 मिलियन डॉलर की तगड़ी रकम खर्च की। बदले में ट्रंप उनके एहसानमंद हुये और उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेट एफीसियेंसी का महकमा उन्हें सौंप दिया। महत्वपूर्ण मौकों पर मस्क उनके बगल में नजर आने लगे। मगर यह रोमांस ज्यादा दिन चला नहीं और गलबहियों का दौर बदमजगी और खटास में बदल गया। पारस्परिक अलगाव का बायस बना ट्रंप का बिग ब्यूटीफुल बिल। मस्क ने इसके लिये ट्रंप की जमकर लानत मलामत की तो ट्रंप ने उन्हें खरी खोटी सुनाकर उन्हें अमेरिका से निकालने और उनकी कंपनियों को संघीय सहायता से मोहताज करने की धमकी दे डाली। मस्क ने कहा कि ट्रंप का कानून अमेरिका को दिवालिया कर देगा। उन्होंने ट्रंप को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इससे आगामी दस वर्षों में 3.4 ट्रिलियन डॉलर का बोझ पड़ेगा और कर्ज की गठरी भारी होगी। ट्रंप ने जवाबी मोर्चा खोलते हुये कहा कि मैं मस्क से बहुत निराश हूँ। मैंने उनकी बहुत मदद की। उन्होंने दलील दी कि करों में कटौती से अमेरिकी नागरिकों के हित सधेंगे। मस्क जितनी संघीय मदद किसी को नहीं दी गयी और यदि इसे बंद कर दिया जाये तो जनाब मस्क फर्श पर आ जाएंगे।
जाहिर है कि दो दिग्गजों का याराना खत्म हुआ और अब दोनों ताकतवर यार एक दूसरे की ओर पीठ कर खड़े हुये हैं। इधर अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस पर ट्रंप का कानून लागू हुआ, उधर मस्क ने अगले ही दिन अमेरिका पार्टी के गठन का ऐलान कर अपने इरादों का सुबूत दे दिया। उन्होंने तीखे बयान में कहा कि हम गैर-जरूरी खर्च और भ्रष्टाचार से बर्बाद करने वाली व्यवस्था में जी रहे हैं। अमेरिका पार्टी के गठन का मकसद है कि अमरीकियों को दोबारा आजादी मिल सके। उन्होंने डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों को इस तरह निशाने पर लिया कि उनकी नजरों में दोनों एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। ज्यादा पांव नहीं पसारने की रणनीति के तहत उन्होंने कहा कि अभी उनका लक्ष्य सीनेट की कुछ सीटों और आठ-दस हाउस ड्रिस्टिक्ट्स तक सीमित होगा। वह अपना ध्यान मिडटर्म निर्वाचन पर केंद्रित करेंगे जो 2026 में होगा।
इसमें शक नहीं कि मस्क राष्ट्रपति ट्रंप को अस्थिर और पंगु करने की रणनीति पर चल रहे हैं। अमेरिका के सियासी मिजाज को देखते हुये उनके लिये क्वांटम-लीप यूं भी संभव नहीं है। अमेरिका में दो सदियों से अधिक की राजनीति में द्विदलीय प्रणाली हावी रही हैं। वहां डेमोक्रेट और रिपब्लिकन प्रत्याशी व्हाइट हाउस पहुंचते रहें हैं। बहुत कम मौके आये हैं, जब तीसरी ताकत को उलटफेर में कामयाबी मिली हो। सन 1912 में राष्ट्रपति रहे रूजवेल्ट को विलियम हॉवर्ड टाफ्ट के खिलाफ 27.4 फीसद वोट और 88 इलेक्ट्रोरल वोट मिले थे, फलत: डेमोक्रेट वुडरो विल्सन ने बाजी मार ली थी। इसी तरह सन 1968 में जार्ज वैलेस को दक्षिणी राज्यों में अच्छा समर्थन मिला था। सन 1972 में अरबपति व्यावसायी रास पेरोट निर्दल खड़े हुये तो उन्हें 19 प्रतिशत वोट मिले। उन्हें इलेक्टोरल कॉलेज का समर्थन तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने डेमोक्रेट बिल क्लिंटन की जीत और जार्ज बुश की हार का सामान जुटा दिया। इसी क्रम में सन 2000 में ग्रीन पार्टी के राल्फ नेडर को 27 फीसद वोट मिले और इस समर्थन ने चुनाव में रिपब्लिकन जार्ज डब्लू बुश की जीत की राह खोल दी और डेमोक्रेट अल गोरे को पराजय का घूंट पीना पड़ा।
जाहिर है कि मस्क के लिए दोनों प्रमुख पार्टियों के मजबूत ढाँचे से टकराना और पार पाना कठिन होगा। अमेरिका में निर्वाचन नियमावलि उन्हें पांव टिकाने का ठौर नहीं देती। मस्क पार्टी गठन के पूर्व किये सर्वे की दुहाई भले ही दें लेकिन उनके लिये ‘बैलेट-एक्सेस’ कठिन होगा। मतपत्रों पर नोंदणी या इंद्राज की प्रक्रिया लंबी है। टीवी पर बहस के लिये भी राष्ट्रीय स्तर पर 15 प्रतिशत समर्थन चाहिये। इसी के चलते ‘विनर टेक आल’ के मिजाज के अमेरिका में जार्ज टाउन विश्वविद्यालय के प्रो. हांस नोएल मानते हैं कि छोटी पार्टियों के लिये पांव टिकाना मुश्किल है।
एसेक्स विश्वविद्यालय की नताशा लिंडस्टैड कहती हैं कि मस्क के पास धन तो है, लेकिन क्या वह जोखिम उठा सकेंगे? बहरहाल नयी पार्टी को लेकर उत्सुकता तो है किंतु राजनीति श्रम और समय साध्य खर्चीली तथा धैर्यपूर्ण प्रक्रिया है। यही नहीं, सियासत और तिजारत के तकाजे भी अलग-अलग होते हैं।
एलेन मस्क ने अपनी रणनीति बताते हुए ग्रीक सेनापति एपेमिनोडास का उदाहरण दिया है कि एक विशेष ठौर शक्ति केंद्रित कर जीत हासिल करो। लेकिन उनका पाला उस ट्रंप से पड़ा है, जो खुद नहीं जानते कि वह कब क्या कहेंगे और करेंगे? इसी के चलते उन्होंने मस्क को अमेरिका से निष्कासन की धमकी दी है। समझा जाता है कि ऐसा उन्होंने स्टीव बेनन की सलाह पर किया है। मस्क का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ और वह सन 1995 में स्टूडेंट वीजा पर अमेरिका आये थे। उन्हें सन 2002 में अमेरिका की नागरिकता मिली। यह उनका दुर्भाग्य है कि राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकते, क्योंकि राष्ट्रपति होने के लिये जन्मना अमेरिकी होना जरूरी है।

आलेख: डॉ. सुधीर सक्सेना
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