घृणा से घृणा: हिन्दी कविता @ डॉ. सुधीर सक्सेना

घृणा से घृणा ( भारत यायावर की कविता पढ़ने के बाद )


हम सब
प्रेम से प्रेम करते हैं
और घृणा से घृणा

बेतरह घाम में
हम तलाशते हैं प्रेम की छांह,
दुर्गंध में सुगंध
तमस में आलोक

बंजर में हम तलाशते हैं नदी,
पोसते हैं खुशियों के ख़्वाब
हम घृणा करते हैं उनसे
जो छींटते हैं हवा में दुर्गंध
इंजेक्ट करते हैं ज़ेहन में ज़हर
रचते हैं लिंचिंग की भूमिका
और ख़ौफ़ का सामान जुटाते हैं बेख़ौफ़

इस दुर्निवार समय में
अनथक चलते हुए हमारे पांव
तलाशते हैं ठाव,
नदी पार जाने के लिए नाव,
आश्वासनों से उकताए हम चाहते हैं
आशाओं के लिए उर्वरक
चाहते हैं उजड़े नहीं, आबाद रहें हमारे गांव

हम घृणा से घृणा करते हैं बेहिसाब और
प्रेम से प्रेम बेपनाह
अमाप्य है प्रेम के लिए हमारी आतुरता
हम सराहते हैं विचारों
और आत्मा का सौन्दर्य,
हम प्रेम वंचितों के जीवन में
प्रेम के आगमन के लिए करते हैं
सच्चे हृदय से प्रार्थना
हम ख़ारिज करते हैं शब्दकोश से
घृणा से उपजे बहुतेरे शब्द

हम घृणा करते हैं
घृणा के उत्स से,
घृणा के अपादानों
और घृणा के उपकरणों से,

हम जानते हैं
कि घृणा के लिए उर्वर समय है यह
फल फूल रही हैं घृणास्पद चीज़ें
सोशल मीडिया की रंध्रों से रिस रही है घृणा
अबाध फड़कती है घृणा की घ्राण
ऐसे में हमें चाहिए और भी अधिक प्रेम
पारंपरिक संग नवाचार

मित्रो,
हम प्रेम से करते हैं प्रेम,
और अपने अक्स से भी करते हैं घृणा
जब कभी हमारे भीतर उपजती है
घृणा की हल्की सी छींट।

  • डॉ. सुधीर सक्सेना, भोपाल
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