सलाम लुई पाश्चर : कविता संग्रह @ डॉ. सुधीर सक्सेना, समीक्षा : संध्या नवोदिता

सलाम लुई पाश्चर : सुधीर सक्सेना
समीक्षा : संध्या नवोदिता
सुधीर सक्सेना का व्यक्तित्व बहुआयामी है. वे पत्रकार हैं, यात्रा संस्मरण उन्होंने खूब लिखे हैं. आदिवासियों पर उनकी एक बहुत शानदार किताब है, बहुत सक्रिय जीवन जीते हैं और लगातार लिखते हैं. उनके लिखने में कभी कोई गैप आता हो ऐसा लगता नहीं है.
लेखकीय कर्तव्य को नियमित निभाने के साथ ही कविताओं में शुरू ही उनका दखल है. उनका लेखन सोद्देश्य और सार्थक होता है. और लीक से हटकर भी. इसी तरह उनका यह संकलन सलाम लुई पाश्चर अब सामने आया है. ये विज्ञान कविताएं हैं. दिलचस्प बात यह है कि विज्ञान कविताएं पूरे देश के स्तर पर ही और खासकर हिंदी में ना के बराबर है. विज्ञान बहुत तार्किक विषय है और कविताएं भावुक प्रकृति की मानी जाती हैं.
सुधीर सक्सेना जी ने दोनों का विलय कर दिया है. तर्क और भावना दोनों साथ साथ चल रहे हैं. यह मेल देखना दिलचस्प है.
पुस्तक के शुरू में उन्होंने एक लंबी भूमिका लिखी है जिसमें उन्होंने तमाम भारतीय वैज्ञानिकों का परिचय दिया है, मुझे आश्चर्य हुआ कि उनकी नजर विज्ञान पर ही नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों के जीवन का भी उनका सुंदर अध्ययन है. इस पुस्तक को पढ़कर आप भारत में विज्ञान की यात्रा के बारे में भी जान सकते हैं. और सरकारों का क्या रुख रहा है इस पर भी एक साफ समझ बन सकती है.
इस पुस्तक को पढ़ते हुए आप विज्ञान के लालित्य में डूबना शुरू कर देते हैं. विज्ञान की तथाकथित नीरसता जैसे कहीं और चली जाती है और आप चांद तारों और अद्भुत प्रयोगों की एक बहुत सुंदर दुनिया में दाखिल हो जाते हैं.
शुक्रिया हेली नाम की उनकी एक कविता है –
आओ तारों
हम शुक्रिया अदा करें
एडमंड हेली का
कि उसने तुम्हें गति में पकड़ा
धूमकेतुओं
शुक्रिया अदा करो
एडमंड हेली का
कि उसने तुम्हें गलियों में पढ़ा
और लिखी आला दर्जे की किताब
सागरों महासागरों
धन्यवाद ज्ञापित करो
एडमंड हेली का
कि उसने डाल दी समुद्र विज्ञान की नींव
और लंबी लंबी यात्राएं कीं समुंदरों की.
विज्ञान कविताएं लिखकर सुधीर सक्सेना ने विज्ञान का कर्ज अदा कर दिया. वे विज्ञान के विद्यार्थी रहे. आगरा कॉलेज से उन्होंने विज्ञान से स्नातक किया है. बाद में पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर भी वह विज्ञान को कभी भूले नहीं. उन्होंने डार्विन, लैमार्क, मेंडेल और ह्युगो डी ब्रीज़ को खूब पढ़ा. कार्ल वॉन लिने यानी कैरोलस लीनियस की द्विनाम पद्धति याद की. कितनी ही वनस्पतियों के नाम उन्होंने कंठस्थ किए. बचपन में देखा गया ध्रुवतारा, सप्तऋषि और तारों भरा आकाश उनके सपनों में बस गए.
इस किताब की भूमिका बहुत सुंदर है जिसमें सुधीर सक्सेना अपनी कविताओं की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए अपने बचपन का ज़िक्र करते हैं. उनकी मां आर्य समाजी थीं और पिता सनातनी यानी दोनों अलग-अलग ध्रुव. और जाहिर सी बात है कि विचार में मां का प्रभाव उन पर ज्यादा पड़ा.
एक बहुत दिलचस्प कविता देखिए-
क्या करता दमित्री इवानोविच?
अगर मेंडेलीफ़ से करने को कहा जाता
मनुष्यों का वर्गीकरण
तो कैसी होती उसकी आवर्त तालिका
इसी तरह एक कविता है-
सलाम लॉर्ड रदरफोर्ड!
अगर प्रयोग धर्मिता परंपरा है
तो उसमें तुम दूसरे पायदान पर हो
माइकल फैराडे के बाद अर्नेस्ट रदरफोर्ड
रसायन और भौतिकी में यक्सां दखल
अलबत्ता जनक तुम नाभिकीय भौतिकी के
कविताओं को पढ़कर ही आभास हो जाता है कि ऐसी कविताएं तभी लिखना संभव है जब आपने वैज्ञानिकों के जीवन को डूबकर महसूस किया हो. यह कविताएं पढ़ने के बाद मैं मैडम क्यूरी को ढूंढना चाह रही हूं कि कवि ने उन को किस तरह देखा है.
मैडम क्यूरी मुझे मिल नहीं रही शायद उन पर लिखना अभी बाकी है.
मैं उनकी एक अन्य कविता पढ़ रही हूँ –
भरोसा
जो तत्व
मेंडलीफ की तालिका में नहीं है
वे भी हैं कहीं ना कहीं
इस दुनिया में
एक दिन उन्हें खोज ही लेगा
कोई ना कोई वैज्ञानिक.
जो सुख
आज नहीं है कहीं भी हमारी जिंदगी में
वह सुख
हम नहीं तो हमारी संततियाँ
तलाश ही लेंगी एक न एक दिन
इसी दुनिया में.
ये कविताएं विज्ञान कविताओं के साथ समाज विज्ञान की कविताएं भी हैं. विज्ञान के प्रतीकों की आँख से समाज को देखा गया है. कई बार इस तरह वे राजनीति को भी समझते हैं. सच कहें तो विज्ञान, राजनीति और समाज पढ़ाई के लिए भले अलग-अलग शाखाएं हो लेकिन जिंदगी के लिए यह सब एक ही हैं.
अम्ल और क्षार
बस्तर के किसी
माड़िया, मुरिया या अबूझमाड़िया से पूछो
तो वह नहीं बता पाएगा
चपोड़ा में मौजूद अम्ल का नाम
और तो और
कोई करजाई नहीं बता पाएगा
खुरासानी इमली में उपस्थित अम्ल के हिज्जे
यह पुस्तक विज्ञान खोजों और वैज्ञानिकों के प्रति प्रेम पैदा करती है. अक्सर हम वैज्ञानिक खोजों के बारे में जानते हैं. लेकिन वैज्ञानिकों के निजी जीवन के बारे में कितना कम जानते हैं. यह कहीं पढ़ने को जल्दी मिलता भी नहीं. कविताओं की यह किताब विज्ञान को सरस नजरिए से देखना सिखाती है. हमें तरल बनाती है. रूखे माने जाने वाले वैज्ञानिकों के जीवन में उत्सुकता पैदा करती है.
यह पुस्तक विज्ञान, दर्शन और कला का सुंदर जोड़ है. ऐसा मेल बहुत कम देखा गया है. आश्चर्य की बात यह है कि हम वैज्ञानिक खोजों से जितना ज्यादा लाभ ले रहे हैं उसकी तुलना में हम वैज्ञानिकों के बारे में ना के बराबर जानते हैं. आज की दुनिया सुख-सुविधाओं से भरी है. जो विज्ञान की खोजों से ही संभव हुआ है.
आज तकनीक के बिना पत्ता तक नहीं मिलता. सुबह से लेकर शाम तक हम तकनीक के गुलाम बने बैठे रहते हैं.
अच्छा, जिस दूध का हम अपने घरों में इस्तेमाल करते हैं, उसे पाश्चराइज्ड करना सिखाने वाले लुई पाश्चर पर एक कविता जरूर पढ़िए. इन्हीं के नाम पर किताब का नाम सलाम लुई पाश्चर है. उन्होंने पाश्चराइजेशन खोजने के अलावा कई अन्य खोजें भी की हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं-
बहुत पेचीदा है सवाल
कि हम उसे किस लिए करें याद
याद करें बैक्टीरियोलॉजी के लिए
या माइक्रोबायोलॉजी के लिए
या किणवन के लिए
अथवा पाश्चुरीकरण के लिए
याद करें
उस विज्ञान के पुरोधा को कैसे?
याद करें
दूध के आस्वाद के लिए
बीयर के झाग से छलकते मगों के साथ
अथवा सुस्वादु वाइन के जाम टकराते हुए
वैज्ञानिक औषधियों के युग आरंभ के लिए
या निरोग भविष्य के स्वप्न दृष्टा इल्म के लिए
या एंथ्रेक्स और रेबीज के टीके के निर्माण के लिए
विज्ञान कविताओं की पुस्तक की भूमिका लिखना भी किसी के लिए आसान नहीं था. विश्व रंग से जुड़े कुलाधिपति संतोष चौबे ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है. उनकी भूमिका भी सरस विज्ञान का एक सुंदर लेख बन गई है.
दिलचस्प है कि विज्ञान कविताओं का यह संकलन सत्य की खोज और प्रयोगधर्मी महात्मा गांधी जी को समर्पित किया गया है. गांधी सुधीर सक्सेना जी को बहुत प्रिय हैं. गांधी आइंस्टीन को भी बहुत प्रिय हैं. जिन्होंने उनके बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही यकीन करेंगे कि इस दुनिया में हाड़-मांस का ऐसा भी पुतला हुआ था.
एक अंतिम कविता से मैं आपको इस संकलन के साथ छोड़ना चाहती हूँ –
दुनिया में
इतने अम्ल हैं
की अम्लीय हो गई है दुनिया
अम्ल बेहिसाब
इतनी तेज
कि उर्दू जुबां में तेजाब
कविताओं की यह किताब विज्ञान की खोजी गई सुंदर दुनिया और अब तक ना खोजी गई रहस्यमयी दुनिया में ले जाने के लिए आपकी उंगली पकड़ना चाहती है.
पुस्तक छपाई के दृष्टिकोण से उत्तम है, प्रूफ की जरा भी गलती नहीं मिलती, पेज क्वालिटी और फॉन्ट बहुत सुन्दर है. कविता के साथ उससे संबंधित वैज्ञानिक की तस्वीर पुस्तक का अतिरिक्त आकर्षण है.
सलाम लुई पाश्चर : सुधीर सक्सेना
(कविता संग्रह)
आइसेक्ट पब्लिकेशन भोपाल
प्रथम संस्करण 2022
मूल्य ₹250
