आपबीती: सिनेमा घरों का गुजरा हुआ जमाना @ डॉ. सुधीर सक्सेना

आपबीती:
सिनेमाघरों का गुजरा हुआ जमाना
• डॉ. सुधीर सक्सेना
यह सिनेप्लेक्स और मल्टी प्लेक्स का जमाना है; आधुनिक और लकदक। मगर एक जमाना था टाकीजों का। तब टाकीजें हुआ करती थीं और टूरिंग टाकीजें भी। टाकीजों में श्रेणियां होती थीं। बाल्कनी ऊपर होती थी और किसी-किसी टाकीज में बॉक्स भी होते थे। बॉक्स शौकीन मिजाज धनाढ्यों की पसंद थे, जबक दर्शक अपनी जेब के मुताबिक टिकटे खरीदते थे। सिनेमाघरों में सुविधायें आहिस्ता-आहिस्ता आईं। देखते ही देखते सौ सालों में उनका हुलिया बदल गया।
संदर्भों को खंगालें तो भारत में पहला सिनेमाघर सन 1907 में खुला था। कलकता तब ब्रिटिश भारत की राजधानी था। सन 1896 में अमेरिका में दुनिया की पहली टाकीज के मान से यह उपलब्धि मायने रखती थी। बहरहाल एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस, जिसे बाद में चैप्लिन सिनेमा के नाम से जाना गया, के मालिक थे एक पारसी सज्जन जमशेद जी फ्राम जी मदान। चौरंगी प्लेस में खुले इस सिनेमा घर ने जल्द ही शोहरत हासिल कर ली और वह सिने दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। आज भारत में सत्रह हजार से अधिक सिनेमाघर हैं। एल्फिंटन ड्रामा क्लब में एक साधारण हेल्पर के तौर पर कौरियर शुरू करने वाले जमशेद जी को मदन थियेटर के नाम से सिनेमा चेन शुरू करने का भी श्रेय प्राप्त है।
जेनजी के लिये सिनेमाघरा के प्रति पिछली पीढ़ियों मिलेनियल्स-के जुनूं की हद तक आकर्षण का अनुमान लगाना कठिन है। सिनेमा तब मनोरंजन का एकमात्र साधन था, जिसमें आमोखास की रूचि थी। बड़े महानगरों को छोड़ दें तो सामान्यत: नगरों में एक-दो टाकीजें हुआ करती थीं। इनके मालिकान अमीर होते थे और मैनेजरों तक रूतबा रहा करता था। कोई धांसू फिल्म आती तो गेटकीपरों की भी पौ-बारह हो जाती थी। बिना टिकट दर्शकों को प्रवेश देकर वे अपनी जेबें गरम कर लिया करते थे। कुछ लोगों पर पहली फिल्म का पहला शो देखने का शौक तारी रहता था। कुछ दर्शक इतने दीवाने होते थे कि जेब में रेजगारी भर के ले जाते थे और ‘मन डोले, तन डोले’ मार्का गानों पर सिक्के उछालते और झूमते थे। फिल्मों में बाकायदा इंटरवल होता था और ‘संगम’ जैसी लंबी फिल्म में दो इंटरवल। इंटरवल के बाद आगामी फिल्मों के ट्रेलर दिखाये जाते थे। अंत में राष्ट्रगीत बहुत बाद में बजने शुरू हुये और उसमें भी बेअदबी के दृश्य देखने को मिले।
मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने सिनेमाघर में पहली फिल्म कब देखी थी। शायद ‘आस का पंछी’ या ‘धूल का फूल’। सन 60 के दशक का पूर्वार्द्ध। वह परिवारों में कड़े अनुशासन का दौर था। सिनेमाघर तक जाने की इजाजत बमुश्किल मिलती थी। सिर्फ उन्हीं फिल्मों को हम बच्चे देख पाते थे, जिन्हें माँ-पिता का स्वयंभू सेंसरबोर्ड पारित कर देता था। हाँ, शहर में आते-जाते फिल्मों के इश्तहारों और टाकीजों में प्रवेशद्वारों के समीप चालू और आगामी फिल्मों की चुनिंदा तस्वीरों को हम लोग बड़े चाव से देखते थे। यह वह दौर था, जब रिक्शों पर दोनों ओर बड़े-बड़े रंगीन पोस्टर लगाकर माइक पर लहराती-बलखाती आवाज में फिल्मों की पब्लिसिटी होती थी और रंगबिरंगे परचे बाँटे जाते थे। अब उनकी कल्पना मुहाल है।
लगातार दो दिन फिल्में देखने का गर्वीला कीर्तिमान सात-आठ वर्ष की उम्र में ही बन गया था, जब (बांस) बरेली में लगातार दो दिन फ्री में फिल्में देखी थीं। फ्री में इस नाते कि शहर की दोनों टाकीजों का बैंक-अकाउंट जिस बैंक में था, उसमें हमारे ताऊ जी मैनेजर थे। सो मुफ्त में फिल्म का मजा लिया और इंटरवल में समोसे और कालाजाम खाने को मिले। तेनो दिवसा: गता:।
बचपन में बच्चों को प्राय: संपूर्ण रामायण, नागज्योति मार्का धार्मिक-पौराणिक फिल्मों की इजाजत थी। दारासिंह की फिल्में भी बच्चों में लोकप्रिय थीं। ‘ए’ प्रमाणपत्र की फिल्में देखना वर्जित था। मसें भीगीं तो उत्सुकता बढ़ी और जिद भी। हेलेन की छवि कैबरे डांसर की थी और कैबरे हम लोगों के लिये वर्जित सनसनी था।
वह टाकीजों में ब्लैक का दौर था। टिकटें ब्लैक में बिकती थीं। प्रबंधकों की मिलीभगत से। ब्लैक और बॉक्स आफिस हिट का सीधा रिश्ता था। कभी-कभी तो टाकीज से मायूस होकर लौटना पड़ता था। ब्लैक में टिकट लेकर देखना शान की बात थी और सहपाठियों-मित्रों में शान बघारने का मुद्दा भी। यह सब जेब की गर्मी पर निर्भर था।
बरसों-बरस टाकीज में फिल्में देखीं और रेडियो सीलोन पर हर बुधवार सुनी बिनाका गीतमाला। आज भी जब-तब जेहन में कौंधती है अमीन सयानी की पुरकशिश आवाज।
कॉलेज से चाट मारकर पहली फिल्म देखी थी आगरा में भगवान टाकीज में ‘जॉनी मेरा नाम, जिसमें पद्मा खन्ना का उत्तेजक नृत्य था और हेमा-देवानंद की दिलकश जोड़ी। साथ में नीरज के गीत। इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा। अगर्चे टाकीज में कोई परिचित मिल जाता तो जान हलक में आ जाती थी कि कहीं घर पर चुगली कर दी तो पड़ेंगे बेभाव। बहरहाल, बीआर इशारा की फिल्में तभी देखीं और नागपुर में लिबर्टी टाकीज में प्रदीर्घ चुंबन के लिये चर्चित फिल्म ‘ज़ब्रो व्स्कीये प्वाइंट’ भी।
रूपहले पर्दे के दो महान कलाकारों-दिलीप कुमार और राज कपूर के अभिनय-द्वंद्व के लिये ‘अंदाज’ विशेष तौर पर देखी थी। खुले आकाश तले पर्दा लगाकर दिखाई गई देखी यादगार फिल्म थी ‘साहब, बीबी और गुलाम’। ये फिल्में कई रोज मुसलसल दिमाग पर छाई रहीं। फिल्मों का जादू गिरफ्त में ले लेता था।
यूं तो हम सब राजकपूर, दिलीप कुमार और राजकुमार के मुरीद थे, लेकिन युवावस्था में गर किसी का जबर्दस्त क्रेज था, तो वह थे राजेश खन्ना। हम सब पहरावे में और मस्ती में उसके लहजे की नकल करते थे। जब-तब उसके जैसी दोनों आंखें मिचमिचाते ओर ‘बाबू मोशाय’ कहते। उसकी आराधना, हाथी मेरे साथी, दुश्मन, बावर्ची, नमकहराम, अवतार, कटी पतंग, अमरप्रेम, प्रेमनगर जैसी फिल्में देखने का मतलब है स्मृतियों के गलियारे में उलटे पांव चलाना। वह सिनेमा का नया दौर था। टाकीज में फिल्मों में भावुक दृश्यों में दर्शकों का सुड़-सुड कर रोना आम बात थी। रूमाल गीले हो जाते थे, लेकिन लोग बरबस छिपाते थे कि उन्होंने टेसुवे बहाये। हमारे एक पत्रकार मित्र ने ‘तीसरी कसम’ ‘इक्कीस बार देखी, फिर भी उनका मन भरा नहीं। हमने कोई भी फिल्म तीन बार से ज्यादा नहीं देखी लेकिन चलती का नाम गाड़ी या पड़ोसन जितनी भी बार देखों आनंद आता है ‘किशोर कुमार और मेहमूद की गायन स्पर्द्धा के दृश्य का जवाब नहीं। टाकीजों के गुजरे हुये जमाने का क्या कहना। वह उत्सव सरीखा था। अब फिल्में बेटी अस्मि की फर्माइश पर देखता हूं। एजेंडा फिल्मों से कोफ्त होती है। हां, कभी-कभार ‘मैं फिर आऊंगा’ जैसी फिल्म भी आ जाती हैं। जमाना बदला, मगर सच कहूं तो याद न जाये बीते दिनों की।
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