आते हैं याद नंबूदिरीपाद @ डॉ. सुधीर सक्सेना

आते हैं याद नंबूदिरीपाद

डॉ. सुधीर सक्सेना

ईएमएस… कहने को फकत तीन अक्षर, मगर इन तीन अक्षरों ने बीती सदी के छठवें दशक में विश्व इतिहास में नयी इबारत लिख दी थी। अहम बात यह है कि केरल के फलक पर लिखी यह इबारत अभी मिटी नहीं है, बल्कि उसकी चमक बरकरार है। साक्षरता के लिए ख्यात सरसब्ज केरल के लोग उस परंपरा को जिलाए हुए हैं, जिसकी नींव ईएमएस ने डाली थी।

ईएमएस यानी ईएमएस नंबूदिरीपाद। नंबूदिरीपाद यानी विश्व के प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री और विचारक, जिनके नेतृत्व में सन् 1957 में केरल राज्य विधानसभा के चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राजनीतिक आकाश में जीत का परचम लहरा दिया था, जिसकी चमक को सुदूर यूएसए तक में महसूस किया गया था।

13 जून, सन् 1909 को पेरिनतालमन्ना में जनमे नंबीदिरीपाद का पूरा नाम था एलमकुलम (ई) मनक्कल (एम) शंकरन (एस) नंबूदिरीपाद। वे ईएमएस के नाम से जाने और पुकारे गये। उन्होंने केरल की राजनीति को नयी दिशा दी और आधुनिक केरल की आधारशिला रखी। मलयाली साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा उन्होंने साम्यवादी विचारधारा को कलम से समृद्ध किया। ब्राह्मण कुल और संपन्न जमींदार परिवार में जनमे ईएमएस ने परंपरा को तिलांजलि देकर केरल में जिस परंपरा का सूत्रपात किया, वह अवरोहों-अघातों के बावजूद अभी भी अक्षुण्ण हैं। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन उसी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई एम या माकपा) के निर्वाचित नेता हैं, जिसके संस्थापकों में ईएमएस  प्रमुख थे। नंबूदिरीपाद के नाम में समाहित एलमकुलम वस्तुत: वह गांव है, जहां ईएमएस पैदा हुए थे। कुलीन ब्राह्मण परिवार में जनमे ईएमएस ने पांच वर्ष की वय में अपने पिता को खो दिया था। पीएम मैथ्यू के अंतरंग सखा रहे ईएमएस ने जातिप्रथा और रूढ़ियों के खिलाफ कम उम्र में ही झंड़ा उठा लिया था। वे जल्द ही उस वल्लुवनाडु योगक्षेम सभा से जुड़ गये, जो प्रगतिशील नंबूदिरी युवकों का जुझारू संगठन था। सेंट थॉमस कॉलेज, त्रिशूर से स्नातक ईएमएस कॉलेज जीवन में कांग्रेस और आजादी की लड़ाई से जुड़े। बताते हैं कि ओजस्वी वक्ता वीजे मथाई को सुनने के लिए वह मीलोंमील पैदल चलकर जाते थे। वह सन् 1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की समाजवादी शाखा कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक थे और सन् 40 तक इसके निर्वाचित राष्ट्रीय सहसचिव रहे। यही वह काल था, जब सन् 1939 में वह मद्रास विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। समाजवादी मूल्यों और श्रमजीवी वर्ग के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के चलते वह कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर आकृष्ट हुए और भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में शुमार रहे। सरकार के कोप से बचने के लिए कुछ अर्सा भूमिगत भी रहना पड़ा।

सन् 1957 में केरल के चुनाव में नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्टों की जीत युगांतकारी घटना थी। ईएमएस ने 5 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनकी कामयाबी न जाने कितनों की आंखों की किरकिरी थी। विश्व इतिहास और भारत-गणराज्य का यह सर्वथा विरल प्रसंग था। उनके लाए भूमि सुधार अध्यादेश और शिक्षा अधिनियम ने केरल की दशा और दिशा बदल दी। लेकिन ईएमएस लंबी पारी नहीं खेल सके। सन् 1959 में केंद्र सरकार ने उनकी सरकार को संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत भंग कर दिया। इस कार्रवाई की निमित्त बनी कांग्रेस की तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती इंदिरा गांधी। बताते हैं कि इस कदम को लेकर प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पसोपेश में थे, लेकिन बेटी की जिद पिता के विवेक पर भारी पड़ी। इस अभूतपूर्व प्रसंग के सिलसिले में अमेरिकी गुप्तचर संस्थआ सीआईए की सक्रियता का भी जिक्र होता है। सीआईए के दस्तावेज और पूर्व अमेरिकी राजदूत एल्सवर्थ बंकर की आत्मकथा इस बात का संकेत देती है कि केरल में कम्युनिस्टों की विजय व्हाइट हाउस के लिए चिंता का विषय थी। बहरहाल, ईएमएस सन् 1960 से 64 के मध्य केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। उनके विचारों और सक्रियता से गठबंधन राजनीति को बल मिला। केरल में गठबंधन राजनीति का प्रयोग सफल रहा। सन् 1967 में ईएमएस पुन: मुख्यमंत्री बने, लेकिन इस बार भी वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनकी सप्तकक्षी मुन्नानी (सप्तदलीय गठबंधन) सरकार, जिसमें भाकपा और मुस्लिम लीग भी थी, अंतर्विरोधों के चलते 24 अक्टूबर, 1969 को गिर गयी। इसी दशक की बड़ी घटना यह रही कि सन् 1964 में सीपीआई के विघटन पर वह सीपीएम के साथ रहे। सीपीएम में उनकी केन्द्रीय महत्ता अक्षुण्ण रही और वे मृत्युपर्यंत पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे। अपने दूसरे मुख्यमंत्रित्वकाल में यंत्रीकृत कॉइर-फैक्ट्री का उद्घाटन कर उन्होंने केरल के आधुनिकीकरण को गति तो प्रदान की ही, अपने लेखों, कार्यों और परामर्श से वे केरल में सीपीएम को बल प्रदान करते रहे। उनका देहांत सन् 1998 में त्रिवेंद्रम में हुआ।

 
ईएमएस के व्यक्तित्व के साथ एक दिलचस्प खूबी जुड़ी हुई है। बोलते हुए वे हल्का-सा हकलाते थे। एकबारगी उनसे पूछा गया,‘ईएमएस आप हकलाते हैं?’ ईएमएस ने सहज भाव से उत्तर दिया, ‘हां, जब मैं बोलता हूं, तब…’

बहरहाल, यह हकलाना उन्हें अक्सर गांभीर्य और वैशिष्ट देता था। उसने उनकी वाक-शैली को अलहदा पहचान दी। वह बहुत प्रभावी वक्ता रहे और उन्हें सुनने के लिए जनमेदिनी उमड़ा करती थी।
ईएमएस राजनीतिज्ञ और विचारक के साथ-साथ पत्रकार और लोकप्रिय लेखक रहे। उनके लिखे को पढ़ा और सराहा गया। केरल के इतिहास पर उनकी किताब को प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। उनकी आत्मकथा साहित्य अकादेमी से पुरुस्कृत कृति है। अलबत्ता उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, स्वतंत्रता-संग्राम, मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी किताबें लिखीं। महात्मा गांधी को ‘हिन्दु-रूढ़िवादी’ मानते हुए ईएमएस की ‘महात्मा एण्ड द इज्म’ और ‘गांधीयम – गांधीसवम’ जैसी कृतियां उपलब्ध हैं। उनका साहित्य ‘संचिका’ (रचनावली) के रूप में प्रकाशित है। ईएमएस, केसरी बालकृष्ण पिल्लै, जोसेफ मुंदासरी, एमके पाल और के. दामोदरन पुरोगमन साहित्य प्रस्थानम के आधारस्तंभ रहे। आधुनिक मलयाली साहित्य के विकास में ‘रूप भद्रता विवादम्’ का खासा महत्व है, जिसमें ईएमएस ने अग्रणी भूमिका निभाई। केसरी से उनका विवाद अत्यंत चर्चा का विषय रहा। ईएमएस ने केसरी को पेटी-बूर्जवा बुद्धिजीवी करार दिया और कला तथा साहित्यिक आंदोलन के प्रति कम्युनिस्ट पार्टी की धारणा के प्रति तीखा रवैया अख्तियार किया।
ईएमएस जीवन के आखिरी क्षणों तक सक्रिय रहे। उन्होंने 88 की पक्की उम्र में सन् 1998 के चुनाव प्रचार में भाग लिया। इस दौरान उन्हें निमोनिया ने जकड़ लिया। उन्हें उपचार के लिए त्रिवेंद्रम के कास्मोपालिटन अस्पताल में भर्ती किया गया। वहीं 19 मार्च, 1998 को अपरान्ह तीन बजकर 40 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। राजधानी के विद्युत शवदाह गृह में राजकीय सम्मान से उनकी अंत्येष्टि हुई। केरल ने नम आंखों से मूल्यों के प्रति समर्पित अपने संघर्षशील सपूत को अंतिम विदाई तो दी, लेकिन केरल के जनमानस में अंकित उनकी छवि आज भी उतनी ही जीवंत और चमकीली है, जितनी बरसों पहले थी। यही नहीं, उनके प्रयासों से साक्षर हुए केरल में उन्हें अत्यंत मनोयोगपूर्वक पढ़ा और याद किया जाता है।

लेखक – डॉ. सुधीर सक्सेना
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