बुकशेल्फ: ‘भूख’/विधान आचार्य

सरोकारों से जुड़ी कवितायें
• डॉ. सुधीर सक्सेना
विधान आचार्य नेपाली कवि हैं; अग्रणी कवियों में शुमार वरिष्ठ नेपाली कवि। नेपाली हिन्दी की सहोदरा भाषा है। नेपाली और हिन्दी में एक और साम्य यह है कि दोनों की लिपि एक है और दोनों साझा संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। इन्हीं विधान का इसी वर्ष हिन्दी कविता संग्रह प्रकाश में आया है, जिसका शीर्षक है – ‘भूख’ प्रकाशक हैं काठमांडू स्थित नेपाल सृष्टा समाज, जिनका यह पहला हिन्दी प्रकाशन है।
विधान आचार्य के साथ कई उल्लेखनीय संदर्भ जुड़े हुये हैं। उनका पहला कविता संग्रह गोरूको कांध सन 1985 में छपकर आया था। उन्होंने लघु कथायें लिखीं, गीत, पटकथा और संवाद लिखे और विभिन्न विषयों पर आलेखन के साथ-साथ पत्रकारिता की और संपादन भी। संप्रति वह त्रिभुवन विश्व-विद्यालयों में रीडर हैं और अपने सरोकारों के लिए जाने जाते हैं। वह उस टोली के सदस्य रहे हैं, जिसने सन 1980 में नेपाल में एकदलीय शासन व्यवस्था के विरूद्ध बहुलवादी राजनीतिक प्रणाली के लिए सड़कों पर कविता क्रांति की थी। वह लेखन में नवाचार और टटकेपन के लिये जाने जाते हैं।
किताब के शुरू में लेखक पुष्पप्रसाद लुइंटेल ने विधान की कविताओं पर कुछ पते की बाते कहीं हैं। पहली यह कि कविता लिखी नहीं जाती, बल्कि अवतरित होती हैं (यानि कही जाती है) और दूसरी यह कि वह सरोकारों को व्यक्त करती है और आत्ममंथन भी है। निस्संदेह ये कविताएं कवि के मनोजगत में गहन आत्ममंथन का अवक्षेपण हैं ओर जैसा कि डॉ. श्वेता दीप्ति कहती हैं, कवि का अनुभव कलात्मक तरीके से शब्दों में गुंजित होता है और उनकी कविता वैयक्तिकता से गुजरती हुई निर्वैयक्तिकता का सफर तय करती है। निश्चित ही इन कविताओं में कवि की आत्मपरिष्कार की व्यग्रता है, प्रेमाकुल मन की अभिव्यक्ति है और अपने सरोकारों के चलते गर्हित रवायतों पर आघात है। सुखद है कि कवि आत्मश्लाघा से च्युत है। वह सत्याग्रही है और रूसी कवि कायसिन कुलियेव की भांति मानता है कि कविता असत्य के खिलाफ सत्य, अंधकार के खिलाफ प्रकाश, बदी के खिलाफ नेकी और युद्ध के खिलाफ शांति के पक्ष में जुड़ी होती है। जैसा कि महात्मा गांधी कहते थे – ‘सत्य ही ईश्वर है’ और ‘प्रार्थना में बड़ी शक्ति है’, इन कविताओं में सत्य की टेक है और बहुधा कवि कविता में प्रार्थना में लीन दिखता है। ‘इन्सान होने की प्रतीक्षा में’ की छोटी-छोटी नौ कवितायें इसका प्रमाण हैं। वह सत्य, मुक्ति, प्रेम और शांति की अविचल कामना से भरा हुआ है और वह मुक्ति के लिए किसी सत्ता का नहीं, अपितु ज्ञान का दास बनने को तैयार है। उसके लिये ओम शांति, बिस्मिल्लाह रहमान-ए-रहीम, हे परमेश्वर बुद्धम शरणं गच्छामि और ओम णमो अरिहंताणम में कोई अंतर नहीं, क्योंकि धर्मान्ध या जड़मति नहीं, बल्कि सेक्यूलर है और ग़ालिब की भांति यह मानते हुये कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना, स्पष्ट कहता है : ‘मैं इस प्रतीक्षा में हूं कि मैं इंसान बनूं।’ इसी क्रम में वह तथागत के ‘अप्प दीपों भव’ को भी दोहराता है। वह ‘मेरा आदमी’ में साफ कहता है कि ‘सृजन में है मेरा आदमी।’
अपनी कविताओं में विधान युद्ध की निरर्थकता के प्रति लोगों को आगाह करते हैं। वह कहते हैं :- ‘बन्दूक कभी भी जिंदगी बन नहीं पायी। बंदूक कभी भी सुहाग बन नहीं पायी (पृष्ठ 25/घोड़ा)। वह मानते हैं कि हर जीन कसे घोड़े को सवार चाहिये। वह सवाल करते हैं : ‘है कोई ऐसा/जिसने जीता हो युद्ध को। और युद्ध से जीता हो जिंदगी को? (वही) विधान की ‘मेरी कविता’ से ज्ञात होता है कि कविता उनके लिये क्या है? वह सब कुछ कर सकता है, परंतु कविता की बलि नहीं दे सकता। कोई घोड़े पाल ले, बैल पाल ले, कुत्ते पाल ले, मगर कविता उसके दायरे से बाहर रहेगी। कविता को कवि किसी की चाकरी में नहीं लगा सकता। समय की बात, प्रीत की चांदनी और रामदुलारी के कबूतर जैसी कविताएं प्रभावशाली हैं और अंतर्मन की अभिव्यक्ति भी। उसे ज्ञात है कि फटे हुये दिल को सीने के लिये तलवार नहीं, सुई चाहिये। वह बच्चे को नववर्ष के तौर पर देखता है; भूखा, नंगा और बिलखता हुआ, जिसे कपड़ा, खाना, पानी और बोलने की शक्ति चाहिये। वह स्वच्छ सांस, स्वच्छ घूंट, सुनिश्चित भविष्य की याचना और आवाहन करता है। उसके मन की तरलता और सौन्दर्यात्मक अभिरूचि की उसकी चांदनी को एक ओढ़ना देने की चाह है। (प्रीत की चांदनी, पृष्ठ 51)। ‘नदियों से’ में कवि नदियों से संवाद करता है और पूछता है कि ओ नदियों/कहां गयीं मेरी मछलियां? ‘मौजूदगी’ में काव्य कौशल है और संवेदनात्मक घनत्व भी। संकलन की अंतिम कविता है ‘बाबूजी’, यह पिता के बहाने मार्मिक प्रसंगों को समेटती है और पिता के लिए लिखी अनेक कविताओं की बरबस याद दिलाती है। कुल जमां ‘भूख’ विधान आचार्य को ऊंची पायदान पर प्रतिष्ठित करता है, क्योंकि उनके पास भावों और शब्दों का सलीका है और सलूक भी।

समीक्षा: डॉ. सुधीर सक्सेना
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