माया का मायाजाल: घोटाले की जांच और FIR में लग गए पूरे ढाई साल, कौन और क्यों बचा रहा था अब तक घोटालेबाजों को..?

कोरबा 16 अगस्त। जिले की पूर्व कलेक्टर रानू साहू और उनकी खासमखास सहायक आयुक्त आदिवासी विकास कोरबा माया वारियर के घोटाले की जांच और एफ आई आर की कार्रवाई में पूरे ढाई साल लग गए। अब जाकर कलेक्टर कोरबा अजित वसंत ने कांग्रेस से रिश्ता रखने वाले चार ठेकेदारों, माया वारियर सहित दो इंजीनियर और एक डेटा एंट्री आपरेटर के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को प्रकरण भेजा है। हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुलिस में FIR दर्ज नहीं हुआ है। यहां सवाल उठना लाजिमी है कि इन घोटालेबाजों को अब तक कौन और क्यों बचा रह था? या कोरबा का जिला प्रशासन “नौ दिन चले, अढ़ाई कोस” की रफ्तार से काम कर रहा है?
दरअसल, वर्ष 2022 में केंद्र सरकार की ओर से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में विकास कार्यों को लेकर कोरबा जिला प्रशासन को 6 करोड़ 27 लाख 56 हजार रुपए प्रदान किए गए थे। इस पैसे से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में छात्रावास का निर्माण, बिजली, पंखा, नलकूप खनन आदि से संबंधित कार्य किया जाना था। इस कार्य के लिए कोरबा जिला प्रशासन ने 6 जून 2022 को एक आदेश जारी किया था। इसके तहत आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त को कार्य एजेंसी नियुक्त किया गया था। उस समय सहायक आयुक्त के पद पर माया वारियर की पदस्थापना थी। बताया जाता है कि उक्त राशि में से 4 करोड़ 95 लाख 79 हजार रुपए आश्रम और छात्रावासों की मरम्मत एवं इनमें सामाग्री की आपूर्ति पर खर्च किया जाना था। इसमें से 4 करोड़ 4 लाख रुपए सिविल कार्य के लिए प्रदान किए गए थे। इस राशि में से लगभग 3 करोड़ रुपए का व्यय तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर के कार्यकाल में हुआ। संविधान के अनुच्छेद 275 ए के तहत प्रदत्त इस राशि से खर्च किए जाने से संबंधित सारे दस्तावेज- मेजरमेंट बुक, देयक की मूल नस्ती कार्यालय में होनी थी, मगर ये सभी दस्तावेज कार्यालय में नहीं मिले। माया वारियर का तबादला हो चुका था। मामला सामने आने पर 22 मई 2023 को कोरबा के तत्कालीन कलेक्टर ने इस मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक टीम का गठन किया। टीम में तत्कालीन अपर कलेक्टर प्रदीप साहू, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग कोरबा, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के तत्कालीन एसडीओ नरेंद्र सरकार, जिला कोषालय अधिकारी, सब इंजीनियर ऋषिकेश बानिक और नगर निगम के सहायक लेखा अधिकारी अशोक देशमुख को शामिल किया गया था। टीम को 15 दिन में जांच पूरी करने के लिए कहा गया था। मगर डेढ़ साल गुजर गए लेकिन टीम मामले की जांच पूरी नहीं कर सकी। इस बीच अपर कलेक्टर प्रदीप साहू का भी तबादला हो गया। उनकी जगह अपर कलेक्टर दिनेश कुमार नाग पदस्थ हो गए। काफी समय तक तो अपर कलेक्टर दिनेश कुमार नाग को मामले की जानकारी ही नहीं हुई। न्यूज़ एक्शन ने अक्टूबर 2024 में उनके संज्ञान में मामला लाया, तो उन्होंने कहा था कि जानकारी लेंगे।

इस बीच बाहर आए दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि केंद्र सरकार से मिले राशि को खर्च करने के लिए आदिवासी विकास विभाग ने नगर निगम कोरबा के अधीक्षण अभियंता एम के वर्मा से तकनीकी स्वीकृति प्राप्त की थी। इसके तहत 17 छात्रावासों का मरम्मत किया जाना था। इसमें नवीन प्री मेट्रिक कन्या छात्रावास मदनपुर और कोरकोमा के अलावा प्री मेट्रिक अनुसूचित जनजाति कन्या छात्रावास कुदमुरा, कोरबा, धनगांव, गोढ़ी, कुदुरमाल, पोड़ी उपरोड़ा, कन्या छात्रावास सेन्हा, कोरबी चोटिया, सिंधिया, पसान, हरदीबाजार, अनुसूचित जनजाति कन्या आश्रम हरदीबाजार के अलावा करतला, रंजना और अरदा के कन्या आश्रम शामिल थे।
इन कार्यों के लिए आदिवासी विकास विभाग के तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर ने प्रत्येक आश्रम के लिए लगभग एक करोड़ 52 लाख रुपए की स्वीकृति प्राप्त की थी। इस बीच पूर्व कलेक्टर रानू साहू जेल जा चुकी थी। ई डी ने अक्टूबर 24 में माया वारियर को भी गिरफ्तार कर लिया था। पुख्ता दस्तावेजों के सामने आने और माया वारियर की गिरफ्तारी के बाद तीन करोड़ी फाइल का मामला फिर सुर्खियों में आया। आपको बता दें कि 22 मई 2023 को कलेक्टर के जांच आदेश का खुलासा सबसे पहले “न्यूज़ एक्शन” ने किया था। बाद में जांच में लेटलतीफी की खबर भी “न्यूज़ एक्शन” ने प्रकाशित की थी, लेकिन प्रशासन अपनी चाल से चलता रहा और जांच की फाइल धूल खाती रही।

ठेकेदारों के कॉकस पर कृपा?
जानकारी के अनुसार आदिवासी विकास विभाग में ठेकेदारों का एक कॉकस है। अफसरों और नेताओं के संरक्षण के कारण कई वर्षों से इस विभाग में कुछ चुनिंदा ठेकेदार कब्जा जमाए बैठे हैं। किसी नए ठेकेदार को यहां टेन्डर फार्म तक नहीं मिलता था। बताते हैं कि जन सम्पर्क विभाग से सांठगांठ कर चंद प्रतियों में टेंडर छपाकर फाइल में लगा दिया जाता था। अन्य ठेकेदारों को टेण्डर की जानकारी भी नहीं होती थी और किसी तरह पता भी चल जाता था, तो उन्हें टेण्डर फार्म ही नहीं दिया जाता था। तीन करोड़ी फाइल गायब होने के मामले में भी यही खेल किया गया। अन्य दस्तावेज भले नहीं मिले मगर ठेकेदारों / सप्लायरों को किये गए भुगतान की जानकारी तो उपलब्ध थी। ठेकेदारों / सप्लायरों से भुगतान से सम्बंधित विवरण क्यों नहीं लिया गया? विवरण प्राप्त कर उनका भौतिक सत्यापन क्यों नहीं किया गया? किसके दबाव और प्रभाव में मामला अब तक दबा हुआ था?
ईडी की गिरफ्त में माया वारियर
उल्लेखनीय है कि अक्टूबर 24 में ही ईडी ने डीएमएफ घोटाले में माया वारियर को गिरफ्तार किया था। माया वारियर जेल में बंद है। उनसे ईडी ने कोरबा में हुए डीएमएफ घोटाले को लेकर लंबी पूछताछ की है। इस मामले में कोरबा की तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू से भी पूछताछ की गई है। माया वारियर निलंबित आई ए एस रानू साहू की सबसे ज्यादा करीबी और राजदार मानी जाती रही है।

माया के किया दोहरा घोटाला
सूत्रों के अनुसार एक ही कार्य के लिए माया वारियर ने अलग अलग मद से दोहरी राशि लेकर बड़ा घोटाला किया है। एक ओर केंद्र सरकार से प्राप्त पैसे को खर्च करने के लिए माया वारियर ने 17 कार्यों की स्वीकृति प्राप्त करवाया। दूसरी ओर इन्हीं कार्यों के लिए डीएमएफ से भी करोड़ों रुपए की राशि निकाली गई। मसलन प्री मेट्रिक अनुसूचित जनजाति कन्या छात्रावास कुदुरमाल के लिए 34 लाख, कन्या छात्रावास कोरबी चोटिया के लिए 34 लाख और इतनी ही राशि कन्या छात्रावास पसान, पोड़ी उपरोड़ा और सिंघिया छात्रावास की मरम्मत के लिए भी निकाली गई। जबकि इन्हीं छात्रावासों की मरम्मत के नाम पर तत्कालीन सहायक आयुक्त ने कुदुरमाल के लिए एक करोड़ 52 लाख 97 हजार, पोड़ी, कोरबी चोटिया, सिंधिया और पसान के लिए भी 1.52 करोड़, 1.52 करोड़ रुपए अपने विभाग में लिया था।

FIR दर्ज कराया जायेगा- कलेक्टर
पूर्व कलेक्टर संजीव कुमार झा ने टीम गठित कर जांच के आदेश दिये थे। लेकिन जांच टीम में शामिल अधिकारियों का सुस्त रवैय्ये के कारण जांच डेढ़ साल बाद भी पूरा नही हो सका। डी एम एफ घोटाले में माया वारियर की गिरफ्तारी के बाद इस मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया, तब कलेक्टर अजीत वसंत ने 7 सदस्यीय टीम गठित कर जांच का आदेश दिया। कलेक्टर अजीत वसंत ने यह भी कहा कि मामला काफी गंभीर है, जिस पर जांच का आदेश दिया गया है। जांच रिपोर्ट में जो भी कर्मचारी या फिर जिला अधिकारी दोषी होगा, उसे बख्शा नही जायेगा। कलेक्टर ने साफ किया कि केंद्र सरकार के करोड़ों रूपये के फंड के दस्तावेज विभाग से गायब है। इस फर्जीवाड़े में जिस भी कर्मचारी और अधिकारी की संलिप्तता पायी जायेगी, सबसे पहले उसके खिलाफ पुलिस में FIR दर्ज कराया जायेगा। वहीं करोड़ों रूपये के फर्जी पेमेंट भुगतान पर भी रिकव्हरी की कार्रवाई की जायेगी।

कलेक्टर अजीत वसंत के आदेश के 10 माह बाद अब जाकर मामले की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है। कलेक्टर की ओर से सहायक आयुक्त श्रीकांत कसेर ने जानकारी दी है कि तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर, सहायक अभियंता अजीत कुमार तिग्गा, उप अभियंता राकेश वर्मा और डेटा ऑपरेटर कुश कुमार देवांगन को दोषी पाया गया है। इसके साथ ही चार ठेका कंपनियों मेंसर्स श्री साई ट्रेडर्स, पालीवाल बुक डिपों, श्री बालाजी मंदिर रोड, आई.टी.आई. रामपुर, कोरबा, मैसर्स श्री साई कृपा बिल्डर्स मंगल भवन, बाजार चौक, छुरी, जिला कोरबा, छ.ग., मेसर्स एस. एस. ए. कंस्ट्रक्शन, मेनरोड चैतमा, साजाबहरी जिला कोरबा एवं मैसर्स बालाजी इन्फ्रास्ट्रक्चर, वार्ड नं. 06, जायसवाल हाउस, राजीव नगर कटघोरा एवं प्रकरण में संलिप्त कुश कुमार देवांगन डाटा एण्ट्री आपरेटर आदिवासी विकास कोरबा के विरूद्ध नामजद F. I. R दर्ज करने के लिए सिविल लाइन पुलिस को पत्र लिखा गया है।
इसके अलावा उक्त प्रकरण में मुख्य रूप से श्रीमती माया वारियर तत्कालीन सहायक आयुक्त आदिवासी विकास कोरबा श्री अजीत कुमार तिग्गा तत्कालीन, सहायक अभियंता आदिवासी विकास कोरवा एवं श्री राकेश वर्मा तत्कालीन उप अभियंता लोक निर्माण विभाग (संलग्न आदिवासी विकास) कोरबा के विरूद्ध वित्तीय अनियमितता एवं विधि संगत कार्यवाही के लिये विभागीय जांच संस्थित करने हेतु संबंधित विभाग को प्रस्ताव प्रेषित किया गया है।
