DSPM के SE सिविल भौयार की भौकाली.. रजिस्ट्रेशन की आड़ में हो रही टेंडर की दलाली

मुख्यमंत्री साय के विभाग में ही सुशासन तोड़ रहा दम
भारतीय संविधान की अधिकारी उड़ा रहे धज्जियाँ
गेट के अंदर खड़ा किया भ्रष्टाचार का साम्राज्य
कोरबा 07 जून। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनी के कोरबा स्थित डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी (DSPM) थर्मल पावर प्लांट में इन दिनों सिविल विभाग के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर (SE) भौयार की भौकाली चरम पर है। अपने चहेते ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए उनके द्वारा नियमों को तोड़ने मरोड़ने से लेकर हर प्रकार के हथकंडे अपनाये जा रहें हैं। साहब का भौकाल ऐसा कि बिना उनकी इजाजत कोई ठेकेदार प्लांट के गेट के अंदर पैर भी नहीं रख सकता। वहीं इस अभियान में उन्हें प्लांट के वरिष्ठ अधिकारीयों का भी पूर्ण समर्थन प्राप्त हो रहा है।
रजिस्ट्रेशन की आड़ में खेला
बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के कोरबा स्थित डीएसपीएम प्लांट के सिविल विभाग में इन दिनों टेंडर दलाली का खेल जोर शोर से चल रहा है और दलाली करने वाले कोई और नहीं, बल्कि विभाग व प्लांट के वरिष्ठ अधिकारी ही है। प्राप्त जानकारी अनुसार कंपनी के ज्यादातर टेंडर ऑनलाइन भरे जाते हैं जिसके लिए ठेकेदारों को कंपनी से वेंडर नंबर लेना अनिवार्य है। वेंडर नंबर लेने के पश्चात ठेकेदार कंपनी का टेंडर ऑनलाइन भर सकते हैं। परंतु टेंडर प्रक्रिया ऑनलाइन होने के कारण प्लांट के अधिकारीयों को अपने चहेते ठेकेदारों को मनमाने रेट में टेंडर दिलाने तथा अपना निजी स्वार्थ साधने में सफलता प्राप्त नहीं हो पाती है।
इसी का तोड़ निकालते हुए प्लांट के सिविल विभाग के द्वारा 2 लाख रुपये तक की निविदाओं को मैन्युअल पद्धति से किया जा रहा है। वहीं मैन्युअल टेंडर में भी कोई अनचाहा ठेकेदार हिस्सा ना ले पाए, इसके लिए विभाग द्वारा 2 लाख तक की निविदाओं में भाग लेने हेतु पृथक से रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य कर दिया गया है। परन्तु ठेकेदार यह रजिस्ट्रेशन तब तक नहीं करवा सकते जब तक विभाग के SE भौयार इसकी इजाजत न दें। कोई ठेकेदार यदि मैन्युअल टेंडर हेतु रजिस्ट्रेशन करने आता है तो उसे पहले साहब से मिलने कहा जाता है। यदि साहब ने हाँ कहा तो ही रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है अपितु उसे वापस जाने कह दिया जाता है। इतना ही नहीं ठेकेदार यदि भौयार साहब से मिलने का पुनः प्रयास करे या इसकी शिकायत करना चाहे तो उसे प्लांट में प्रवेश नहीं दिया जाता। अधिकारी से फोन पर बात कराने के बहाने उसे प्लांट के दरवाजे से ही टरका दिया जाता है।
अब आश्चर्य की बात यह है कि जिस कंपनी में कोई भी ठेकेदार ऑनलाइन माध्यम से बड़े से बड़ा टेंडर डाल सकता है, उसी कंपनी में 2 लाख का टेंडर डालने के लिए पृथक से रजिस्ट्रेशन करवाने कहा जाता है वरना उसे टेंडर में भाग लेने नही दिया जाता। आसान भाषा में कहें तो आप कंपनी में वेंडर नंबर लेकर 2 करोड़ के टेंडर में भाग ले सकते हैं परंतु भौरया साहब की इजाजत के बिना 2 लाख के टेंडर में भाग नहीं ले सकते। ऐसा नियम शायद ही देश या प्रदेश के किसी अन्य शासकीय विभागों में आपको देखने को मिलेगा।
उदाहरण स्वरूप निचे दर्शित निविदा को ही देख लिजिए। 2 लाख के ऑफिस फर्नीचर व अलमारी खरीदी की निविदा में सिविल कार्य में अनुभवी तथा “ब व ऊपर” श्रेणी में पंजीकृत ठेकेदार का मापदंड निर्धारित किया गया है। अब अलमारी और फर्नीचर कंक्रीट या पत्थर से निर्मित चाहिए जिसके लिए सिविल का अनुभव आवश्यक है या स्वर्ण व रत्न जड़ित जिसके लिए “ब व ऊपर” श्रेणी का ठेकेदार होना आवश्यक है, यह तो विभाग के अधिकारी ही बता सकते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कर रहे अधिकारी
सुशासन का दावा करने वाले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को शायद यह सुनकर अच्छा ना लगे परंतु उनके विभाग के अधिकारी भारत के संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। जिस प्रकार से अधिकारियों द्वारा निविदाओं में मनमानी की जा रही है और अन्य ठेकेदारों को निविदा में भाग लेने से रोका जा रहा है वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण प्रदान करता है। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और किसी भी प्रकार के भेदभाव से बचाता है।
प्लांट में प्रवेश देने हेतु सुरक्षा गार्ड के द्वारा व्यक्ति को अंदर पदस्थ किसी अधिकारी से फोन पर बात करवाने कहा जाता है। जिस विभाग में उक्त व्यक्ति को कार्य है उस विभाग का नाम बताने के पश्चात भी उसे अंदर प्रवेश नहीं दिया जाता। ऐसे में जो व्यक्ति प्लांट में पदस्थ किसी अधिकारी से संपर्क में ना हो या वह पहली बार किसी निविदा में भाग लेने प्लांट जा रहा हो उसे अंदर प्रवेश नहीं दिया जाता है। इधर-उधर से यदि किसी अधिकारी का फोन नंबर मिल भी जाता है तो अधिकारी के द्वारा उक्त व्यक्ति का फोन नहीं उठाया जाता और उसे गेट से ही वापस होना पड़ता है। कई मौकों पर तो सुरक्षा गार्ड के द्वारा अधिकारियों को फोन पर व्यक्ति का नाम और कार्य बताने के बाद भी अधिकारियों द्वारा उसे प्रवेश देने से मना कर दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर गेट पर साहब के चहेते ठेकेदारों की गाड़ियों का ब्रेक लगने से पहले ही प्लांट के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। ठेकेदारों व व्यवसायिओं की तो छोड़िए, प्लांट में अधिकारीयों की तानाशाही ऐसी है की पत्रकारों का भी प्रवेश वर्जित है।
DSPM बना KGF, गेट की दूसरी ओर भ्रष्टाचार का साम्राज्य

कोरबा का DSPM अधिकारियों के भ्रष्टाचार का KGF बन चुका है। बाहरी दुनिया से कनेक्शन कट कर अधिकारियों द्वारा गेट के अंदर जनकोष को जमकर चूना लगाया जा रहा है। NHAI में राखड़ आपूर्ति घोटाला हो या अभी कुछ दिन पहले उजागर हुआ गुड़ खरीदी घोटाला, प्लांट के अंदर अधिकारियों की मनमानी बेरोक टोक जारी है जिसमें मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, कार्यपालन अभियंता जैसे वरिष्ठ पदों पर बैठे अधिकारी भी शामिल हैं।

मतलब साफ है कि कद्दू कटेगा तो सब में बटेगा। शायद इसलिए ही करोड़ों के राखड़ घोटाले से संबंधित दस्तावेज कार्यालय से चोरी करने का प्रयास किया गया परन्तु मामले में प्लांट के उच्च अधिकारियों द्वारा कोई FIR करना भी उचित समझा नहीं गया। अब यदि मुख्यमंत्री के विभाग में ही अधिकारियों की ऐसी कार्यशैली रही, तो आगामी दिनों में विष्णु सरकार के सुशासन का ढोल फटते देर नहीं।
