कोयला के अंधाधुंध दोहन से जल स्त्रोतों पर प्रतिकूल असर, गर्मी में पानी के लिए करनी पड़ रही मशक्कत

कोरबा 23 अपै्रल। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (स्श्वष्टरु) द्वारा संचालित खदानों के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। गेवरा और दीपका जैसे प्रमुख कोयला खनन क्षेत्रों के निकटवर्ती गांवों में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि भूमिगत जलस्तर में गिरावट और प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने से पेयजल संकट विकराल रूप ले चुका है।

कोयला खनन के लिए भूगर्भ में लगातार दोहन किए जाने से न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हुआ है, बल्कि इससे जल स्रोतों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां हैंडपंपों से आसानी से पानी मिल जाता था, वहीं अब कई हैंडपंप पूरी तरह सूख चुके हैं। कुछ गांवों में तो वर्षों पहले लगे हैंडपंप निष्क्रिय हो चुके हैं, जबकि अन्य जल स्रोतों में भी पानी की मात्रा में भारी कमी आई है।

ग्रामीणों के अनुसार, अब वे दिन में घंटों मेहनत कर पानी की व्यवस्था करते हैं। कुछ स्थानों पर लोगों को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। पानी लाने में लगने वाले समय और श्रम के कारण अन्य दैनिक कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि जल संरक्षण को लेकर समय-समय पर चर्चा तो होती है, लेकिन कोरबा जिले में कोयला खनन की गतिविधियों में हो रही तेजी के बीच जल संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। लोगों का आरोप है कि साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और संबंधित विभागों ने इस गंभीर विषय पर गंभीरता नहीं दिखाई।

ग्रामीणों की मांग है कि कोल कंपनियां और प्रशासन मिलकर इस जल संकट से निपटने के लिए तत्काल प्रभाव से योजनाएं बनाएं और अमल में लाएं। वर्षा जल संचयन, कृत्रिम जलाशयों का निर्माण और पुनर्भरण योजनाएं इस दिशा में कारगर हो सकती हैं।

वर्षा जल संचय करना ही होगा
पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के स्टेट चेयरमेन संदीप सेठ का कहना है कि जलसंकट की जो स्थिति अभी है वह भविष्य के लिए भयावह हो सकती है। जीवन के लिए पानी जरूरी है। सभी को सोचना होगा कि वर्षाजल संचय क्यों आवश्यक है।

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