अरे! वो कालिया, कितने पार्षद जिताकर लाए थे? कितने गद्दार निकले?

कोरबा। नगर पालिका निगम कोरबा के सभापति के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की करारी हार के बाद 7 के दशक की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले के गब्बर सिंह का एक डायलॉग लोगों की जुबान पर आ गया है। बदले हुए शब्दों में लोग कह रहे हैं- अरे! वो कालिया, कितने पार्षद जीता कर लाए थे? कितने गद्दार निकले?
पिछले दिनों हुए नगर पालिका निगम के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के महापौर प्रत्याशी ने करीब 50 हजार वोट से जीत हासिल की थी। इसके साथ ही 67 वार्ड में से 45 वार्डों में भारतीय जनता पार्टी के पार्षद चुनकर आए थे और आम जनता ने भाजपा को विशाल बहुमत दिया था। नगर निगम के सभापति के चुनाव में माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी आराम के साथ सभापति चुन लिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल को पार्षदों ने तीसरे स्थान पर धकेल दिया। जबकि दूसरे स्थान पर भारतीय जनता पार्टी की टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़कर पार्षद चुने गए प्रत्याशी अब्दुल रहमान ने कब्जा जमा लिया। इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी से बगावत कर सभापति का चुनाव लड़ने वाले बागी प्रत्याशी नूतन सिंह ठाकुर ने सबसे अधिक मत हासिल कर सभापति का प्रतिष्ठा पूर्ण चुनाव जीत लिया।
आधिकारिक चुनाव परिणाम के अनुसार भाजपा के बागी प्रत्याशी नूतन सिंह ठाकुर को 33, निर्दलीय अब्दुल रहमान को 18 और भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल को 16 वोट प्राप्त हुए।
आपको बताते चलें कि नगर निगम चुनाव में टिकट वितरण के समय भी पार्टी में भारी असंतोष था। लेकिन प्रदेश में सरकार होने के कारण लोगों ने चुप्पी साध ली थी। बावजूद इसके कुछ लोगों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था और ऐसे 7 बागी उम्मीदवार अपना दम दिखाते हुए पार्षद चुनकर आए हैं। अगर संगठन के नेता दूर दृष्टि से कम लेते तो चुनाव के बाद इन 7 पार्षदों की घर वापसी हो चुकी होती। लेकिन भाजपा नेताओं ने एक जुमला कंठस्थ के रखा है, कि पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बलराज मधोक के पार्टी से बाहर जाने पर, कल्याण सिंह और उमा भारती के बाहर जाने पर कोई फर्क नहीं पड़ा, तो गली मोहल्ले के नेताओं के जाने से क्या फर्क पड़ेगा? इसी तरह एक सभापति का चुनाव हार जाने से क्या फर्क पड़ेगा? अब इन नेताओं को कौन बताए कि 100 रुपयों को जेब में रख कर चलते समय एक रुपया गिर जाए और बाद में 100 रुपया मिल भी जाए तो आपकी जेब में 199 ही होंगे, 200 नहीं। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में भाजपा इस घटनाक्रम पर क्या कदम उठाती है?
