बुक-शेल्फ : द’ एवरेस्ट गर्ल, संकल्प और जिजीविषा की जय-यात्रा @ डॉ. सुधीर सक्सेना

समीक्षा: डॉ. सुधीर सक्सेना
मनुष्य के साहसिक अभियानों पर जब-तब किताबें आती रहती हैं, लेकिन बहुत कम किताबें ऐसी होती हैं, जो उस संकल्प और जीवट को वर्णित कर सकें, जिनकी कोख से अभियान जनमता, उमगता और पूरा होता है। बीते साल एक किताब आई है ‘द एवरेस्ट गर्ल’। कृतिकार हैं ब्रजेश राजपूत। आवरण पर बोल्ड शीर्षक के ऊपर थोड़े छोटे हरूफ़ में लिखा है : एक साधारण लड़की की असाधारण कहानी। यह साधारण लड़की कौन है, यह जानने के लिये आपको 170 पन्नों के उस कलेवर से गुजरना होगा, जिसे ब्रजेश ने अत्यंत मनोयोग से लिपिबद्ध किया है। यह साधारण लड़की है मेघा परमार। मध्यप्रदेश में सीहोर जिले में नामालूम से भोजनगर गांव में साधारण कृषक परिवार में जनमी मेघा, जिसने 22 मई, सन 2019 को विश्व के सर्वोच्च शैल-शिखर को फतह किया। मेघा मध्यप्रदेश की पहली पर्वतारोही है, जिसने माउंट एवरेस्ट को जीता। इस नाते वह एवरेस्ट गर्ल कहलाई। उसी की जिंदगी की सच्ची कहानी पर आधारित है यह किताब। यह किताब सही अर्थों में मेघा के अटूट संकल्प और अदम्य जिजीविषा की जय-यात्रा की गाथा है। ब्रजेश ने इसे औपन्यासिक शैली में प्रस्तुत किया है। बिला शक उनके पास वह कीमिया है, जिसके बूते वह सागरमाथा-कन्या के मनस में पैठते हैं और उसकी संवेदनाओं और अनुभूतियों से एकाकार होकर उन्हें बखूबी व्यक्त करते हैं।

किताब में चौदह अध्याय हैं और यह गाथा ‘मैं वापस नहीं जाऊंगी’ से शुरू होती है। मेघा अपने शेरपा निम्मा दाई से यह बात जब चीख कर कहती हैं, तब उसके और एवरेस्ट के दरम्यां फ़कत सात सौ मीटर का फासला था। शेरपा बईनी को समझाता है। उस बईनी को जिस पर एवरेस्ट विजय की ज़िद और जुनूं तारी है। इसके जरिये पाठकों में अबूझ जिज्ञासा जगाकर कथानक फ्लैश बैक में चला जाता है और पाठक स्वयं को मेरा गांव मेरा बचपन के बहाने भोजनगर में पाता है। बचपन और कैशोर्य की कहानी के बहाने हम गांव के परिवेश, मान्यताओं, वर्जनाओं, रूढ़ियों और रीति-रिवाज से परिचित होते हैं। इसमें पिता पर सूतक का भूत उतारने का दिलचस्प प्रसंग है। यह वह गांव है, जहां वीरांवाली होने से लड़कियों की शान बढ़ती है। जहां प्रेम का इजहार अच्छा नहीं माना जाता। जहां पाठशाला में छात्र-छात्राएं अलग-अलग, दूर-दूर बैठते हैं। जहां पुत्र और पुत्री के साथ सलूक में फर्क होता है। जहां कर्मकांड का बेतरह प्रचलन है। इस तरह लेखक बरबस अपने समय को दर्ज करता है। बहरहाल, एनएसएस से जुड़ाव से मेघा के सपनों को पंख लगते हैं। स्नेह सम्मेलन में प्राचार्य महोदया की पेशीनगोई अच्छी लगती है कि यह लड़की किसी दिन आकाश छुवेगी और बहुत ऊंचाई पर पहुंचेगी। गुवाहाटी और कानपुर की यात्राएं उसके मनस को बदल देती हैं। चैनल से जुड़ाव उसके संपर्कों के दायरे को विस्तार देता है।

मेघा सपना देखती है। रोमांचक सपना, लेकिन उसकी पूर्ति आसान नहीं। राह में रोड़े ही रोड़े हैं। मेघा एकदा अखबार में प्रदेश के दो पर्वतारोहियों के चित्र देखती है, जो एवरेस्ट फतहकर लौटे थे। बस यह खबर उसकी दशा और दिशा बदल देती है। इसके बाद पर्वतारोहण का जुनूं होता है और जुनूं की गिरफ्त में मेघा। बेस कैंप की यात्रा का ब्यौरा पाठकों को लुकला, फाकदिंग, नाम्चे बाजार, थ्यांगबोचे, फेरिचे, लोबुचे और गोरक्शेप की दिलचस्प सैर कराता है। स्पांसरशिप के लिए वह पापड़ बेलती है, लेकिन युक्ति काम नहीं आती। बहरहाल, उसकी जद्दोजहद देखते ही बनती है। ऐसी हताशा में एसआर मोहंती जैसे संवेदनशील अफसर उसके प्रेरक संबल बनते हैं। वह मनाली में पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लेती है, लेकिन हादसे में उसकी मेरूदण्ड क्षतिग्रस्त हो जाती है। पढ़ना दिलचस्प है कि कैसे मेघा हादसे की पीड़ा और खंडित मनोबल से उबरती है। शिखर के पास से वापसी के बाद वह जिस मन:स्थिति से गुजरती और फिर मनोबल बटोरती है, उसका चित्रण गौरतलब है। एकबारगी वह खुदकुशी को भी अग्रसर होती है। कुणाल और दिल्ली में अपरिचित आटोचालक के प्रसंग मार्मिक हैं। ऐसा ही वह प्रसंग मर्मस्पर्शी है, जब मेघा अपने और एवरेस्ट के बीच आ रहे केशों को कटा लेती है और तमाम फोन नंबरों को डिलीट करती है। उपन्यास का ग्यारहवां और बारहवां अध्याय पठनीय है कि वह दमखम बढ़ाने के कठोर अभ्यास और फिर एवरेस्ट की ओर के प्रसंगों को समेटती है। आखिरी अध्यायों के कई प्रसंग लोमहर्षक हैं। प्रसाद सर का चरित्र आकर्षक है। लेखक चीजों को ब्यौरों के बजाय बारीकियों में पकड़ता है। एक जगह नायिका कहती है, “मैं घोड़े नहीं, याक बेचकर सोती रही।” यह लोकेल (स्थान) की गहरी पकड़ दर्शाता है। ऐसे ही ‘पहाड़ आदमी को सख्त बनाते हैं’ जैसे कथन की व्यंजना बड़ी है।

समीक्षक: डॉ. सुधीर सक्सेना

किताब में बतौर मोरेल-बूस्टर ‘माझी : द माउंटेन मैन’ और ‘चक दे इंडिया का भी जिक्र है। किताब की खूबसूरती कि लेखक पाठक को पहाड़ की चढ़ाई पर 8848 मीटर ऊंचे तिकाने ठौर यानि समिट पिरामिड तक साथ लेकर चलता है और पाठक को विजेता के एहसास से सराबोर कर देता है। न तो उसकी शैली गूढ़ है और न ही भाषा क्लिष्ट या अलंकृत। वह सरल-सहज और बोधगम्य है। ब्रजेश कथानक को प्रामाणिकता और विश्वसनीयता प्रदान करने में कामयाब रहे हैं। ब्रजेश श्रव्य-दृश्य, माध्यम में महारत के लिए जाने जाते हैं, किंतु यह कृति उनकी पत्रकारीय यात्रा में मुद्रित माध्यम के सुदृढ़ देहरी होने की तस्दीक करती है। ब्रजेश ने यह सत्य-उपन्यास प्रथम-पुरूष में लिखा है। एक तरह से यह परकाया प्रवेश का उदाहरण है। शायद मेघा भी अपनी आपबीती को इतनी साफगोई, बेबाकी और दक्षता से नहीं लिख पातीं। बिला शक फ्लैप पर ब्रजेश का यह परिचय भ्रामक और अपूर्ण है कि वह टेलीविजन-पत्रकार हैं। दरअसल, ‘द एवरेस्ट गर्ल’ उनकी किस्सागोई को बखूबी उजागर और स्थापित करती है और साधुवाद की पात्रता देती है।

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