छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट: परिवार में एक भी सरकारी सदस्य होने पर नहीं मिलेगी अनुकंपा नियुक्ति

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा कानूनी फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी मृत सरकारी सेवक के परिवार का कोई भी सदस्य पहले से ही सरकारी नौकरी में कार्यरत है, तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं मिलेगा.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि इस बात की जांच नहीं की जा सकती कि सरकारी सेवा में कार्यरत वह सदस्य परिवार को आर्थिक सहायता दे रहा है या उनसे अलग रह रहा है.

क्या है पूरा मामला?
यह मामला दुर्ग निवासी वीरमणि सोनवानी से जुड़ा है. उनके पिता थान सिंह सोनवानी कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत थे, जिनका 19 अक्टूबर 2016 को सेवाकाल के दौरान निधन हो गया था.

पहला आवेदन निरस्त: पिता के निधन के बाद वीरमणि ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया. लेकिन विभाग ने 7 मार्च 2020 को इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता का भाई पहले से ही सरकारी नौकरी में है. अदालत का दरवाजा खटखटाया: इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर कोर्ट ने विभाग को परिवार की निर्भरता की जांच करने के निर्देश दिए थे.

दोबारा निरस्त हुआ आवेदन: विभाग ने जांच के बाद 12 अगस्त 2021 को आवेदन को फिर से खारिज कर दिया.

याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में तर्क दिया गया कि उनका भाई उनसे अलग रहता है और परिवार को किसी भी तरह की वित्तीय सहायता नहीं देता है. इसलिए वे पूरी तरह अपने पिता पर आश्रित थे.

नियमों से परे जाकर नहीं दी जा सकती अनुकंपा: हाई कोर्ट
जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की नीति और हाई कोर्ट की ‘फुल बेंच’ द्वारा पहले तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को सही ठहराया.

“अनुकंपा नियुक्ति कोई नियमित भर्ती नहीं है, बल्कि यह संकट के समय परिवार को तत्काल राहत देने की एक नीतिगत व्यवस्था है. जब नीति के नियमों में स्पष्ट रूप से यह प्रतिबंध है कि परिवार में किसी के सरकारी नौकरी में होने पर अनुकंपा नहीं दी जा सकती, तो कोर्ट इस बात की जांच का आदेश नहीं दे सकता कि नौकरीपेशा सदस्य आर्थिक सहायता दे रहा है या अलग रह रहा है.”

हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद याचिकाकर्ता की याचिका को पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया. इस फैसले से अब प्रदेश में अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लेकर चल रहे कई संशयों पर विराम लग गया है.

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