पर्यावरणीय समस्याः पावर प्लांट की राख से दम तोड़ रही हसदेव नदी

कोरबा 22 मई। जीवनदायिनी हसदेव नदी इन दिनों गंभीर प्रदूषण की मार झेल रही है। पावर प्लांट्स से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश) लगातार नदी में समाहित हो रही है, जिससे नदी की सेहत बिगड़ती जा रही है। हाल ही में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल (सीएसईबी) के पावर प्लांट का राखड़ बांध गांव झाबू में फूटने से स्थिति और भयावह हो गई।

बिजली उत्पादन के दौरान निकलने वाली राख को पाइपलाइन के जरिए राखड़ डैम में डंप किया जाता है, लेकिन रखरखाव में लापरवाही के चलते यह राख रिसकर हसदेव नदी तक पहुंच रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि वर्षों से जारी है।
लगातार राख के प्रवाह से नदी का दायरा साल-दर-साल कम होता जा रहा है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक नदी की जलधारण क्षमता में गिरावट आई है और सिल्ट की मात्रा बढ़ती जा रही है, जो नदी के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है।

हाल ही में झाबू में राखड़ डैम फूटने के बाद राख कई किलोमीटर तक नदी में फैल गया था। हालांकि इस मामले में जांच और कार्रवाई की बात कही गई, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह समस्या नियमित रूप से सामने आती है और स्थायी समाधान अब तक नहीं हुआ।

गांव झाबू के निवासी जयपाल सिंह के अनुसार, “नदी का पानी अब मैला हो गया है। हम इसी पानी से नहाने और पीने का काम करते हैं। राख का बहाव लगातार जारी रहता है, जिससे जीवन प्रभावित हो रहा है।”

पर्यावरण एक्टिविस्ट लक्ष्मी चौहान के अनुसार, केंद्र सरकार और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (छळज्) ने राख के 100ः उपयोग (न्जपसप्रंजपवद) का नियम बनाया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा। 500 मेगावाट के प्लांट के लिए तय मानकों के बावजूद राख प्रबंधन में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हसदेव नदी का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह से नष्ट हो सकता है। इसका सीधा असर आम लोगों के जीवन, जल स्रोतों और पर्यावरण पर पड़ेगा।

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