भारत केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि शासन, कला, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में अग्रणी हैः सतीश

आरएसएस की प्रमुखजन गोष्ठी में कई विषयों पर मंथन
कोरबा 23 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित प्रमुखजन गोष्ठी में वैचारिक स्वतंत्रता, भारतीय संस्कृति और शिक्षा प्रणाली जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम रविवार को कोरबा स्थित राजीव गांधी ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में प्रांत जनजातीय कार्य प्रमुख सतीश गोकुल पण्डा ने अपने विचार रखे।
अपने संबोधन में सतीश गोकुल पण्डा ने कहा कि भारत की स्वाधीनता के 75 वर्षों बाद भी समाज में वैचारिक पराधीनता का भाव बना हुआ है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि आज भी लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि पश्चिम की हर चीज श्रेष्ठ है और भारतीय परंपराएं कमतर हैं, जबकि इस मानसिकता को बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि “अंग्रेजीयत के चश्मे” को हटाकर भारत को अपनी दृष्टि से देखने की सोच विकसित करनी होगी।
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि जब अंग्रेज भारत आए, तब यहां की मजबूत संस्कृति और परिवार व्यवस्था ने समाज को एकजुट बनाए रखा था। नालंदा विश्वविद्यालय की पुस्तकों को जलाने के बावजूद ज्ञान परंपरा खत्म नहीं हुई और गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान का प्रवाह जारी रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि अंग्रेजों ने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के जरिए भारतीय समाज की सोच को बदलने का प्रयास किया, जिसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है। पण्डा ने कहा कि भारतीय समाज को अपने गौरवशाली अतीत को समझते हुए पश्चिमी प्रभाव के अंधानुकरण से बाहर निकलना होगा। उन्होंने इसे एक प्रकार की वैचारिक विकृति बताते हुए इससे उबरने का आह्वान किया।
गोष्ठी में भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि पर भी चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि लगभग 1000 वर्ष पहले भारत विश्व की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता था और विभिन्न क्षेत्रों में उसका विशिष्ट स्थान था। इस दौरान उन्होंने प्रसिद्ध अर्थशास्त्रीय संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि शासन, कला, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में भी अग्रणी रहा है।
