बृजमोहन ने संसद में हाशिये पर पड़ी बात की, मगर…

बृजमोहन ने संसद में हाशिये पर पड़ी बात की, मगर

रिपोर्ट- राजेश अग्रवाल


रायपुर के सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल ने हाल ही में लोकसभा में छत्तीसगढ़ में बढ़ते प्रदूषण का मुद्दा उठाया है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर राजनेता अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन अग्रवाल ने न केवल इस समस्या को संसद के पटल पर रखा, बल्कि इसके समाधान के लिए ठोस और त्वरित कार्रवाई की मांग भी की। छत्तीसगढ़ जैसे औद्योगिक रूप से विकसित होते राज्य में प्रदूषण का यह मसला न केवल पर्यावरण, बल्कि जनस्वास्थ्य और आजीविका के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है।
अग्रवाल ने अपने संबोधन में रायपुर, कोरबा और भिलाई को उन 131 शहरों में शामिल बताया, जो राष्ट्रीय प्रदूषण मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। रायगढ़ और जांजगीर-चांपा की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। रायपुर के बाहरी इलाकों जैसे, सिलतरा और उरला में औद्योगिक गतिविधियों के कारण हवा और पानी का प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनकी आजीविका पर भी प्रतिकूल असर डाल रही है।
यह भी बता दें कि अग्रवाल ने नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) द्वारा रायपुर के 142 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में किए गए व्यापक अध्ययन का जिक्र किया है और इसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। हैरानी हो सकती है कि एक सत्तारूढ़ दल के सांसद को अपने ही इलाके की प्रदूषण से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए संसद में आवाज उठानी पड़ रही है।
बृजमोहन अग्रवाल ने संसद में यह मांग भी की, कि पूरे राज्य में पर्यावरणीय मूल्यांकन के लिए एक नई और व्यापक स्टडी होनी चाहिए, जो 2025 तक प्रदूषण के स्तर और पर्यावरणीय मानकों को स्पष्ट रूप से मैप कर सके। यह सुझाव दूरदर्शी है, क्योंकि इसके बिना दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम उठाना मुश्किल होगा।
पता नहीं, किसी विशेषज्ञ से पूछकर यह बात की, या खुद अध्ययन किया लेकिन बृजमोहन अग्रवाल ने बड़े-बड़े तथ्य रखे। उन्होंने जैव विविधता पुनर्स्थापन की बात की, पौधारोपण पर जोर दिया। कृषि को इको फ्रैंडली बनाने की बात की, बागवानी पर जोर दिया।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें इस मांग को गंभीरता से लेंगी? नीरी की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा? बृजमोहन अग्रवाल का यह कदम छत्तीसगढ़ के लोगों की आवाज को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने का एक साहसिक प्रयास तो है, मगर पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचाने वाली उनकी ही सरकार की नीति का क्या, जिसमें घने जंगल कोयला निकालने के लिए बर्बाद किए जा रहे हैं।

प्रस्तुति: डॉ. सुधीर सक्सेना
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